नगर क्षेत्र से उत्पाती बंदरों को पकड़कर जंगल में छोड़ने का अभियान शुरू होने के बाद वन विभाग और नगर पालिका को वाहवाही तो मिल रही है, लेकिन वर्षों से आबादी क्षेत्रों में रह रहे बंदरों को जंगलों में खाने के लिए भोजन मिल पाएगा, यह सवाल भी उठने लगे हैं।
जंगलों में नहीं है खाने-पीने को
जंगलों में न तो फलदार पेड़ हैं और ना ही पानी की कोई व्यवस्था है। बंदरों के उत्पात से परेशान नगरवासियों की पहली मांग इनसे निजात दिलाना था। वन विभाग ने बंदरों को पकड़ने की कार्ययोजना तो तैयार की, लेकिन जंगल में बंदरों के खाने की कोई व्यवस्था नहीं की।
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बहुगुणा विचार मंच के संयोजक हरीश पुजारी का कहना है कि वर्ष 2011 में जिले में बंदर बाड़ा बनाए जाने की मांग उठाई गई थी। राज्य में खंडूड़ी सरकार ने बाडे़ के निर्माण को बजट भी स्वीकृत कर दिया था। लेकिन अभी तक बाडे़ का निर्माण नहीं हो पाया है।
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बंदरों को जंगलों में छोड़ा जाने से पहले जंगलों में फलदार पेड़ लगाए जाने चाहिए। पर्यावरण शिक्षक धन सिंह घरिया का कहना है कि बंदरों को आबादी क्षेत्र से हटाकर बंदर बाड़े में रखा जाना चाहिए। जहां उन्हें कोई नुकसान न पहुंचे।