हरिद्वार में गंगा के किनारे हर रोज होने वाले अवैध खनन का सही आंकलन तो किसी के पास नहीं लेकिन हर रात में करोड़ों रुपए का कारोबार होता है।
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निजी नाप भूमि पर हो रहा यह कारोबार गंगा के आस पास बसे लगभग 40 गांवों के लिए नासूर बन गया है।
निजी नाप भूमि पर आवंटित चुगान के पट्टों पर खनन
स्थानीय लोगों की निजी नाप भूमि पर आवंटित चुगान के पट्टों पर खनन माफियाओं की जेसीबी का शोर सरकार और प्रशासन को सुनाई नहीं देता।
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इस क्षेत्र में पहुंचने पर लगता है कि यहां पर कानून का राज नहीं बल्कि खनन माफियाओं का राज है। इतना सबकुछ होने पर भी यह चुनावी मुद्दा नहीं है। ना सत्तापक्ष के लिए और ना ही विरोधी दलों के लिए।
हरिद्वार जिला प्रशासन ने गंगा केआस पास स्थानीय लोगों की निजी नाप भूमि पर व एकाध राजस्व भूमि पर जीएमवीएन को दिए गए चुगान व खनन के पट्टो की संख्या कुल 22 पट्टे आवंटित हैं।
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ज्यादातर की अवधि भी पांच साल के लिए हैं। इन 22 पट्टों का क्षेत्रफल 49.0747 हेक्टेयर है और यहां से प्रतिवर्ष 8222035 टन उप-खनिज (रेत, बजरी, बोल्डर, पत्थर) उठान की अनुमति है।
लेकिन खनिज से जुड़े एक अफसर की माने तो इतना कारोबार एक महीने में ही हो जाता है। यह सब किसानों की जमीन हैं, लेकिन कई सफेद पॉश इस जमीन का सीना चीरकर अपने घर भरने में लगे हैं।
रात में माल लेकर निकलते है दर्जनों ट्रक
अब यह प्रथा यहां के लोगों के लिए सिरदर्द बनती जा रही है। ऐसे खनन माफिया यहां पर सक्रिय हो गए हैं कि किसान करे भी तो क्या। एक मंत्री जी के दर्जनों ट्रक रात में माल लेकर निकलते है।
कांग्रेस व भाजपा के आधा दर्जन विधायक या तो किसान को आवंटित इस पट्टे पर सीधे कारोबार कर रहे हैं और या फिर अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं।
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प्रशासन को सब पता है, सरकार भी हर गतिविधि से वाकिफ है लेकिन यह क्षेत्र अब किसी भी सरकार के लिए दुधारू गाय बन चुका है।
यहां के लोगों की समस्या दूर करने की बात सोचने तक की फुरसत नहीं है। हरिद्वार केविपक्षी विधायक भी प्रतीकात्मक रूप से ही विरोध जताते हैं। यह पूरा एरिया खनन माफियाओं की जद में है।
हरिद्वार में एसडीएम व खनिज अधिकारी या एडीएम स्तर के कई अधिकारियों के नाम चर्चा में हैं जो कि यहां तैनाती पाने के बाद करोड़पति हो गए।
लेकिन जिसकी भूमि पर पट्टा है उसके पास संसाधन नहीं है, मुंह बंद रखने के लिए संतोषजनक धनराशि पहुंच जाती है।
कभी माफिया के हाथों अफसर पिटते हैं तो कभी स्थानीय लोगों के साथ मारपीट होती है लेकिन फिर भी चुनाव में यह मुद्दा नहीं है। क्योंकि हमाम में सब नंगे हैं।
जब जहर बन जाता है गंगा का पानी
सरकारें आती जाती रही लेकिन इस मर्ज के कर्ज को किसी ने नहीं उतारा। हर बरसात में हरिद्वार के चालीस से ज्यादा गांव जलमग्न हो जाते हैं। गांवों में रहना मुश्किल होता है।
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उस समय तो एनडीआरएफ व तमाम संसाधन झोंके जाते हैं लेकिन बाद में कोई सुध लेने वाला नहीं मिलता। न स्थानीय विधायक और ना ही प्रशासन।
हरिद्वार से भाजपा से पूर्व सीएम डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक मैदान में हैं, उन्होंने भी उम्मीदें पूरी नहीं की।
कांग्रेस से सीएम हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत मैदान में है, हरीश अभी मुख्यमंत्री है और सीटिंग एमपी के साथ ही केंद्रीय जल संसाधन मंत्री रहने के दौरान हजारों लोगों की इस मुसीबत को दूर नहीं कर सके।
गंगदासपुर, सौपरी, पंडितपुरी, महाराजपुर, रणजीतपुर, जसपुर, डुमनपुरी, कलसिया, बालावाली, गिद्दावाली, शेरपुरबेला, माडाबेला, नाईवाला, चंद्रपुरी, दल्लेवाला, मथाना, राजपुर, हस्तमौली, आलमपुरा, इदरीशपुर, तुगलपुर, नंदपुर, पीठापुरी, बहादराबाद, मखियाली समेत लगभग चालीस गांव इस भयावह तकलीफ को झेलने के लिए मजबूर हैं।