हिमालयी क्षेत्र के इको सिस्टम में बड़े बदलाव हो रहे हैं। जिससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और ये उत्तराखंड के लिए बड़ी तबाही का सबब बन सकते हैं।
वैज्ञानिक जेसी कुनियल के मुताबिक हिमालय में नदियों के स्रातों के पास बनी झीलें दबाव बढ़ने पर भारत के इंडो-गंगेटिक क्षेत्रों के अलावा पाकिस्तान, भूटान, बांग्लादेश और नेपाल में कहर बरपा सकती हैं।
जी हां, एक तरफ तो ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं, और दूसरी तरफ ग्लेशियरों के खिसकने से हिमालय के बीचों बीच कई छोटी-छोटी झीलें बन रही हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लेशियरों के बीच में ये झीलें बर्फ के पिघलने से बनी हैं, जो हिमाचल, उत्तराखंड में कभी भी तबाही ला सकती हैं। चिंताजनक यह है कि इनसे निपटने के लिए सरकारी तंत्र के पास फिलहाल कोई विकल्प तक नहीं है।
मनाली में इसरो आब्जरवेटरी सेंटर की ग्लेशियरों पर ताजा रिपोर्ट चौंकाने वाली है। इसके मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग के चलते ग्लेशियर पिघलने की गति चिंताजनक है। ग्लेशियरों से पिघला पानी हिमालय में एक दर्जन से ज्यादा छोटी-बड़ी झीलों के रूप में इकट्ठा हो रहा है।
सतलुज, चिनाब, ब्यास और मंदाकिनी नदियों के स्रोतों के पास इन झीलों का बढ़ता आकार बहुत खतरनाक है। यहां झीलों के भीतर पानी का दबाव इतना बढ़ रहा है कि कभी भी इनके टूटने की स्थिति बन सकती है।
इसरो वैज्ञानिक के. कुलकर्णी के साथ रिसर्च कर रहे जीवी पंत पर्यावरण अनुसंधान केंद्र, कुल्लू के वैज्ञानिक डॉ. जेसी कुनियाल ने बताया कि लाहौल की गेपांग घाट झील की जद में सामरिक महत्व का मनाली-लेह राजमार्ग भी आ रहा है।