हरिद्वार में गंगा के सतीघाट पर जब 157 सालों बाद शहीदों की अस्थियां गंगा में प्रवाहित की गई तो आजादी की पहली क्रांति फिर से ताजा हो उठी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के 282 शहीदों की अस्थियों को 157 साल बाद गंगा मां की गोद मयस्सर हुई।
पंजाब के अमृतसर के अजनाला के कुंए में 157 साल तक दफन रही अस्थियों को निकालकर हरिद्वार में गंगा के सतीघाट लाया गया।
282 शहीदों की अस्थियां गंगा में विजर्सन के लिए दो बड़े बाक्स में रखकर सुबह 11 बजे हरिद्वार में कनखल के सतीघाट पर पहुंची। अस्थियों को पंजाब के अमृतसर से अजनाला तहसील से गुरूद्वारा शहीदों वाला कुआं कमेटी के लोग लेकर पहुंचे। जिस समय अस्थियां घाट पर पहुंची तो वहां पर उपस्थित सभी लोगों की आंखे नम हो गई।
देशभक्ति के नारों से गूंजता रहा घाट
घाट पर अस्थियों के पहुंचते ही लोगों ने शहीदों की विरासत करे पुकार, 1857 के शहीदों को लाल सलाम, इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाने शुरू कर दिए। पूरा वातावरण देशभक्ति के जज्बे से गूंजता रहा।
इसके बाद अस्थियों को घाट पर दर्शन के लिए रखा गया। सभी ने पुष्प अर्पित कर शहीदों को श्रद्घांजलि दी। इसके बाद शहीदों के आजादी के लिए किए गए बलिदान को याद किया और शहीदों की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित किया गया।
इस मौके पर पंजाब से आए कमेटी के अध्यक्ष अमरजीत सिंह सरकारिया, महासचिव काबल सिंह शाहपुर, कोषाध्यक्ष हरभजन सिंह नेपाल, शहीद भगत सिंह नौजवान सभा से सरबजीत सिंह हैरी, इतिहासकार सुरेंद्र कोछर, हरिद्वार से आश्रमों के महंत एवं महामंडलेश्वर दर्शानंद महाराज, देवेंद्र पुरी, शारदा महाराज, शरदपुरी, बनारस से स्वामी शारदानंद गिरि, कामरेड सचिव आशीष मित्तल, धरमपाल, ओमपाल सिंह आदि शामिल हुए। संचालन गंगा सभा के कार्यकारी अध्यक्ष पुरुषोत्तम शर्मा गांधीवादी ने किया।
अंग्रेजों ने मारकर कुएं में किया था दफन
इतिहासकार सुरेंद्र कोछड़ ने बताया कि 10 मई 1857 को मेरठ की छावनी में सैनिकों ने बगावत की थी। उसी के साथ कईं छावनियों में भी भारतीय सैनिकों ने बगावत शुरू कर दी। लाहौर की मिया मीर छावनी और बंगाल की इन्फेंट्री की 26 रेजीमेंट के सिपाहियों ने भी बगावत कर दी।
यह बागी सैनिक अमृतसर जिले की अजनाला तहसील स्थित डंडिया गांव में पहुंच गए। तत्कालीन जमीदारों ने अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर फैड्रिक हेनरी कूपर को सूचना दी। ब्रिटिश फौज के सिपाहियों ने 218 सैनिकों को गोलियों से भून डाला। शेष 282 को रस्सों से बांध कर अजनाला लाया गया।
अगली सुबह 237 को गोलियां से भून डाला। इन सभी को और 45 जिंदा सैनिकों को एक सूखे कुएं में डाल दिया उसके बाद कुआं बंद कर दिया। तब से इस कुएं को ‘कालियां दा खूहं’ अर्थात ‘काले लोगों का कुआं’ कहा जाता है।
सुरेंद्र कोछड़ ने बताया कि कुएं वाली जमीन के ऊपर 42 वर्षों से गुरु ग्रंथ साहब का प्रकाश हो रहा है। कुएं का महत्व पता चलने पर प्रकाश अन्य जगह ले जाया गया और कुएं की खुदाई की। उसके बाद रक्त मिश्रिम मिट्टी (अस्थि के रूप में) बाहर निकाली गई। अस्थियों का कुछ भाग रावी नदी में प्रवाहित किया। शेष आज हरिद्वार में प्रवाहित किया गया।