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महामना ने हरिद्वार में दी थी अंग्रेजों को पटखनी

Thu, 25 Dec 2014 01:38 PM IST
कौशल सिखौला/अमर उजाला, हरिद्वार
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महामना मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा से गंगा नगरी हरिद्वार बेहद खुश है। वास्तव में महामना ने हरिद्वार का इतिहास बचा लिया, भले ही इसके लिए उन्हें भूगोल बदला पड़ा हो। मालवीय धर्म क्षेत्र में सदा-सदा के लिए दर्ज हो गए।
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1914 में ठीक 100 वर्ष पहले हरिद्वार में एक नया इतिहास रचना शुरू हुआ था। इसकी परीणिती 1916 में हुई। ब्रिटिश सरकार गंगा पर बांध बनाना चाहती थी। हरिद्वार के तीर्थ पुरोहित नहीं चाहते थे कि हरकी पैड़ी और अन्य घाटों पर बांध से निकला बंधा हुआ गंगा चल पहुंचे।

पुरोहितों की मान्यता थी कि बंधे हुए जल से तर्पण नहीं हो सकता। यह आंदोलन जोर पकड़ गया और महामना मालवीय ने काशी से आकर इसकी बागड़ोर संभाल ली। अंतत: महामना की जीत हुई और हरिद्वार का इतिहास बच गया।
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भीम गोड़ा बैराज हरकी पैड़ी से ऊपर बनाने के बजाय एक अविच्छिन्न धारा अंग्रेजों को छोड़नी पड़ी। गंगा के उस पार नीलधारा पर भूगोल बदलते हुए बांध का निर्माण करना पड़ा।

ब्रिटिश सल्तनत के खिलाफ छेड़ा आंदोलन

वर्ष 1935 जब ब्रिटिश सरकार ने हरकी पैड़ी पर कथा करने पर प्रतिबंध लगा दिया तो महामना मालवीय ने एक बार फिर पुरोहितों को साथ लेकर ब्रिटिश सल्तनत के खिलाफ आंदोलन छेड़ा।

उन्होंने स्वयं हरकी पैड़ी पर ब्रिटिश कानून तोड़कर स्वयं कथा सुनाई। ब्रिटिश सरकार इस बार भी झुक गई। तब से कथा आज तक जारी है। 1939 में ब्रिटिश सरकार के अधिकारी और पुलिसकर्मी जब चमड़े की बेल्ट लगाकर हरकी पैड़ी क्षेत्र में जाने लगे, तब महामना ने एक बार फिर आंदोलन किया। ब्रिटिश सत्ता हिल गई और बेल्ट व बटुआ बाहर रखकर भीतर जाने का आदेश अधिकारियों को दिया गया।

गुरुकुल के समकक्ष खड़ा किया ऋषिकुल
महामना मदन मोहन मालवीय ने जब देखा की हरिद्वार जैसे महा तीर्थ पर आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानंद ने गुरुकुल की स्थापना की है तो वह विचलित हो उठे।

उन्हें लगा कि तीर्थ पर सनातन मूल्यों का खंडन किया जाएगा। महामना ने करीब 40 एकड़ भूमि हरिद्वार के बीचों-बीच दान में लेकर ऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम विद्यापीठ की स्थापना की।

यह विद्यापीठ आज भी सनातन संस्कृति का ज्ञान बांट रही है। यही नहीं उत्तराखंड प्रदेश का सबसे बड़ा आयुर्वेद महाविद्यालय भी ऋषिकुल में चल रहा है।
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भारत रत्न से खुशी की लहर

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिए जाने की सूचना पूरे उत्तराखंड में खुशी की लहर है। जिस वक्त उत्तराखंड अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया उस वक्त अटल ‌बिहारी भारत के प्रधानमंत्री थे। इस लिहाज से अटल बिहारी को भारत ‌रत्न दिए जाने की खबर से उत्तराखंड में उल्‍लास का माहौल है।

इसके साथ ही महामना मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न दिए जाने का अनेक धर्मज्ञों ने स्वागत किया है। गंगा सभा के कार्यवाहक अध्यक्ष गांधीवादी पुरुषोत्तम शर्मा, महामंत्री वीरेंद्र श्रीकुंज, कार्यकारी महामंत्री श्रीकांत वशिष्ठ, सभापति ओमप्रकाश शर्मा आदि ने केंद्र सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया।

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम, वरिष्ठ संत ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी, निवृत्त शंकराचार्य स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि, पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती, योग गुरु स्वामी रामदेव, आचार्य बालकृष्ण, अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमहंत हठयोगी दिगंबर आदि ने महामना मालवीय को भारत रत्न देने के लिए प्रधानमंत्री को बधाई संदेश भेजा है।
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