राज्यपाल ने मामूली बदलाव के बाद उत्तराखंड लोकायुक्त एक्ट 2014 को मंजूरी दे दी है। संशोधन के बाद लोक सेवकों के खिलाफ अभियोग चलाने की अनुमति देने का अधिकार अब राज्य सरकार को मिल गया है।
विधानसभा से पारित बिल में यह शक्ति केंद्र के पास थी। इसी के साथ लोकायुक्त चयन के लिए सर्च कमेटी गठन की भी एक्सरसाइज शुरू हो जाएगी।
जनवरी में आया था लोकायुक्त बिल
जनवरी माह में बुलाए गए विधानसभा के विशेष सत्र में राज्य सरकार ने भाजपा की खंडूड़ी सरकार के लोकायुक्त एक्ट को निरस्त कर केंद्र के लोकपाल को स्वीकार कर लिया था। विधानसभा से पारित होने के बाद विधेयक को राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा गया।
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केंद्र के लोकपाल में नियम था कि किसी लोक सेवक (आल इंडिया सर्विस के अफसर) के खिलाफ वृहद स्तरीय जांच या अभियोग चलाने के लिए केंद्र से मंजूरी लेनी होगी। क्योंकि लोकायुक्त की कार्यवाही केंद्रीय भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत संचालित होगी।
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कुछ कानूनी विशेषज्ञों का यही कहना था कि जब केंद्रीय एक्ट से लोकायुक्त की कार्यवाही संचालित होनी है तो फिर लोक सेवकों के खिलाफ कार्यवाही के लिए केंद्र से ही अनुमति ली जाए।
मामूली संशोधन के साथ मंजूरी
इसी कारण बिल को मंजूरी मिलने में राजभवन में इतना समय लगा। बुधवार की शाम अचानक राज्यपाल डा.अजीज कुरैशी ने मुख्यमंत्री हरीश रावत को बुलाकर विचार-विमर्श किया। यही नतीजा निकला कि लोक सेवकों के खिलाफ कार्यवाही के लिए मंजूरी का अधिकार केंद्र के बजाय राज्य के पास हो।
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मामूली संशोधन के साथ राज्यपाल ने एक्ट को मंजूरी दे दी। राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद अब जल्द ही लोकायुक्त के गठन की अधिसूचना जारी हो जाएगी।