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लोकसभा चुनाव 2019: जब एनडी तिवारी और सतपाल महाराज ने लिया था पुरानी हार का बदला

Wed, 27 Mar 2019 03:07 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal विपिन बनियाल, अमर उजाला, देहरादून
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एनडी तिवारी - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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उत्तराखंड में लोकसभा चुनाव के इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस का वर्चस्व नजर आता है। मगर वर्ष 1996 की एक बात को हमेशा याद किया जाएगा। इस वर्ष के लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के वर्चस्व को तिवारी कांग्रेस ने जबरदस्त चुनौती दी थी। पांच में से दो लोकसभा सीट जीतकर सबको चौंका दिया था।

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कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका रहा, क्योंकि भाजपा तो फिर भी तीन सीटें जीत गई, लेकिन कांग्रेस का खाता ही नहीं खुल पाया। एनडी तिवारी खुद नैनीताल सीट से जीते, जबकि सतपाल महाराज को लगातार दो चुनाव हारने के बाद तीसरे में विजय हासिल हुई। महाराज के लिए यह जीत दोहरी खुशी लेकर आई। एक तो हार का सिलसिला टूटा और दूसरा उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री बनने का मौका मिल गया।

वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस से नाराज होकर पार्टी के कद्दावर नेता एनडी तिवारी ने अलग राजनीतिक दल बना लिया था। इसे तिवारी कांग्रेस नाम दिया गया था। कांग्रेस के कई नेता तिवारी कांग्रेस में शामिल हो गए थे। पार्टी ने पांचों लोकसभा सीटों पर प्रत्याशी घोषित किए थे। उत्तराखंड के अलावा देश के अन्य राज्यों में भी तिवारी कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे थे।

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एनडी खुद नैनीताल सीट से उम्मीदवार बतौर चुनाव मैदान में आए थे

उत्तराखंड की बात करें, तो एनडी खुद नैनीताल सीट से उम्मीदवार बतौर चुनाव मैदान में आए थे। अपने करीबी सतपाल महाराज को उन्होंने गढ़वाल सीट पर उम्मीदवार बनाया था। टिहरी सीट पर नवप्रभात, अल्मोड़ा सीट पर बलराम सिंह और हरिद्वार सीट पर दाल चंद्र को उम्मीदवार घोषित किया गया था। तिवारी कांग्रेस के उम्मीदवारों की मौजूदगी ने चुनावी समीकरणों को काफी प्रभावित किया था। किसी को उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस से अलग होकर तिवारी कांग्रेस इस तरह का कमाल कर डालेगी।

लोकसभा का यह चुनाव एनडी और महाराज के लिए व्यक्तिगत तौर पर भी बहुत अहम रहा। दोनों नेताओं ने अपनी पिछली हार का बदला अपने चिर परिचित प्रतिद्वंदियों से लिया। वर्ष 1991 में एनडी ने भाजपा के जिन बलराज पासी से शिकस्त खाई थी, इस चुनाव में उन्होंने उन्हें आसानी से हरा दिया।

इसी तरह, महाराज 1991 के चुनाव में बीसी खंडूड़ी से पार नहीं पा सके थे, लेकिन इस चुनाव में उन्होंने पुराना हिसाब चुकता कर लिया। तिवारी कांग्रेस की चुनौती के बीच कांग्रेस हर सीट पर बुरी तरह हारी। हरीश रावत जैसे कद्दावर नेता तब अल्मोड़ा सीट से जीत नहीं पाए और बची सिंह रावत को सफलता मिल गई। भाजपा ने इस चुनाव में अल्मोड़ा के अलावा, टिहरी और हरिद्वार की लोकसभा सीट जीती। तिवारी कांग्रेस ने कांग्रेस का इस चुनाव में बड़ा नुकसान किया। यह अलग बात है कि बाद में एनडी तिवारी कांग्रेस में लौट आए और तिवारी कांग्रेस का वजूद कांग्रेस में ही समाहित हो गया।
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