उत्तराखंड की बात करें, तो एनडी खुद नैनीताल सीट से उम्मीदवार बतौर चुनाव मैदान में आए थे। अपने करीबी सतपाल महाराज को उन्होंने गढ़वाल सीट पर उम्मीदवार बनाया था। टिहरी सीट पर नवप्रभात, अल्मोड़ा सीट पर बलराम सिंह और हरिद्वार सीट पर दाल चंद्र को उम्मीदवार घोषित किया गया था। तिवारी कांग्रेस के उम्मीदवारों की मौजूदगी ने चुनावी समीकरणों को काफी प्रभावित किया था। किसी को उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस से अलग होकर तिवारी कांग्रेस इस तरह का कमाल कर डालेगी।
लोकसभा का यह चुनाव एनडी और महाराज के लिए व्यक्तिगत तौर पर भी बहुत अहम रहा। दोनों नेताओं ने अपनी पिछली हार का बदला अपने चिर परिचित प्रतिद्वंदियों से लिया। वर्ष 1991 में एनडी ने भाजपा के जिन बलराज पासी से शिकस्त खाई थी, इस चुनाव में उन्होंने उन्हें आसानी से हरा दिया।
इसी तरह, महाराज 1991 के चुनाव में बीसी खंडूड़ी से पार नहीं पा सके थे, लेकिन इस चुनाव में उन्होंने पुराना हिसाब चुकता कर लिया। तिवारी कांग्रेस की चुनौती के बीच कांग्रेस हर सीट पर बुरी तरह हारी। हरीश रावत जैसे कद्दावर नेता तब अल्मोड़ा सीट से जीत नहीं पाए और बची सिंह रावत को सफलता मिल गई। भाजपा ने इस चुनाव में अल्मोड़ा के अलावा, टिहरी और हरिद्वार की लोकसभा सीट जीती। तिवारी कांग्रेस ने कांग्रेस का इस चुनाव में बड़ा नुकसान किया। यह अलग बात है कि बाद में एनडी तिवारी कांग्रेस में लौट आए और तिवारी कांग्रेस का वजूद कांग्रेस में ही समाहित हो गया।