बेशक गांवों तक सरकारी बैंक पहुंच गए हैं, लेकिन उनके पास साहूकारी का कोई तोड़ नहीं है। गांव और कसबों में ही नहीं, शहर तक में भी लोग जरूरत पड़ने पर साहूकारों से महंगा कर्ज ले रहे हैं।
यही वजह है कि दून में दो-तीन सालों में साहूकारी का पंजीकरण कराने वालों की संख्या बढ़ी है। साहूकारी को खत्म करने के लिए बैंकिंग व्यवस्था की शुरुआत की गई थी लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद इनकी संख्या दोगुना हो गई है। जानकार इसकी वजह बैंकों से कर्ज लेने में तमाम कागजी कार्रवाई और साहूकारों से आसानी से कर्ज मिलना बताते हैं।
साहूकारों का पंजीकरण जिला प्रशासन करता है। यहां पर कुछ ही साहूकारों ने पंजीकरण कराया है। बहुत से बिना पंजीकरण कराए ही ऋण वितरण का धंधा कर रहे हैं। इसके बावजूद दो साल से जिला प्रशासन में साहूकारी का पंजीकरण कराने वालों की संख्या बढ़ी है। हालांकि इस बीच पुलिस की रिपोर्ट नहीं लगने से प्रशासन ने चार साहूकारों के पंजीकरण निरस्त किए हैं।
इस पेशे से जुड़े लोगों का आकलन है कि साहूकारी का जिले में 90 करोड़ का टर्नओवर है। साहूकार ऋण वितरण निम्न और निम्न-मध्यम वर्ग में ज्यादा करते हैं।
साहूकारी का पंजीकरण करने से पहले एसडीएम और पुलिस से जांच कराई जाती है। इनकी रिपोर्ट के बाद पंजीकरण होता है। पंजीकरण का हर साल नवीनीकरण होता है। नवीनीकरण नहीं कराने, पुलिस रिपोर्ट नहीं लगने पर पंजीकरण निरस्त कर दिया जाता है।
-झरना कमठान, एडीएम प्रशासन