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अपनी ही जिंदगी देख सहम उठीं लड़कियां

Sat, 05 Jul 2014 04:15 PM IST
आफताब अजमत/ अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड के पहाड़ पर किशोरियों को शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए जागरूक करने गई एमकेपी पीजी कॉलेज की छात्राओं ने जमीनी हकीकत देखी तो सहम गईं।
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‘हमारी जिंदगी तो कहीं बेहतर है।’
कहीं नवीं कक्षा की छात्रा गोद में अपने नन्हे बच्चे को थामे हुए थी तो कहीं दूसरी कक्षा की बच्ची पर भाई की देखभाल का जिम्मा आ पड़ा था। कुम्हलाते बचपन को देख इन छात्राओं के मुंह से यही निकला, ‘हमारी जिंदगी तो कहीं बेहतर है।’

उत्तरांचल एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका (ऊना) प्रदेश में बेटियों को शिक्षा से जोड़ने के मकसद से वॉइस फॉर गर्ल्स प्रोजेक्ट चला रही है।

एमकेपी की छात्राओं तृप्ति ध्यानी, मिलन बिष्ट, अंजलि जखमोला और शिल्पा थापा को इसके लिए चुना गया। उन्हें दो-दो के ग्रुप में टिहरी के बीन और नुखेन गांव भेजा गया।
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16 साल की किशोरी की गोद में बच्चा
जहां 11 से 16 साल की किशोरियों को शिक्षा, अधिकार और कॅरियर विकल्प पर जागरूक करना था। दून लौटकर छात्राओं ने बताया कि गांवों में बेटियों को आठवीं तक की शिक्षा सिर्फ इसलिए दी जा रही है कि वे अच्छे घर में ब्याही जा सकें।

तृप्ति ने बताया कि उन्हें एक 16 साल की किशोरी मिली, जिसकी गोद में बच्चा था। पूछने पर उसने बताया कि बच्चे की मां वही है तो तृप्ति चौंक गई।

पता चला कि क्षेत्र में आठवीं के बाद लड़कियों की शादी हो जाती है। वह किशोरी नवीं में पढ़ रही थी। मिलन बिष्ट ने बताया कि कक्षा दो एक छात्रा इसलिए स्कूल नहीं जा रही थी कि उसकी मां को खेतों पर जाना पड़ता है।

इस दौरान छोटे भाई की देखभाल वही करती है। शिल्पा और अंजलि ने बताया कि क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में बच्चियों को अपना नाम भी लिखना नहीं आता।

बताया कि उन्होंने 14 दिन तक गांव में इन किशोरियों और उनके परिजनों को शिक्षा, स्वास्थ्य आदि बिंदुओं पर जागरूक किया।

बेटों को भी बेहतर शिक्षा नहीं
आम तौर पर यही माना जाता है कि ग्रामीण अंचलों में बेटियों को बेटों की शिक्षा की कीमत चुकानी पड़ती है। लेकिन इन छात्राओं के अनुभव बताते हैं कि पहाड़ पर बेटों की शिक्षा की स्थिति भी बेहतर नहीं।
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छात्राओं ने बताया कि पहाड़ पर लड़कों को भी इतनी ही शिक्षा दी जाती है कि वे हिसाब-किताब कर सकें। उन्हें इस तरह तैयार किया जाता है कि वे गांव में पारंपरिक खेती से जुड़े रहें।
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