कुंवर संजय सिंह और डा. प्रशांत सिंह की टीम ने आखिर एक सप्ताह बाद राजधानी देहरादून के बाजावाला फुलसनी में आदमखोर गुलदार का खौफ खत्म कर दिया। इनमें से एक के लिए जनता को दहशत से मुक्ति दिलाने का यह काम शौक है तो दूसरे के लिए परिवार की सदियों पुरानी परंपरा का निर्वाह। दोनों का यह 11वां शिकार था। इससे पहले उत्तराखंड में ये दोनों दस आदमखोरों को ढेर कर चुके हैं।
बाजावाला में गुलदार को मारने पहुंचे शिकारियों की टीम मुरादाबाद निवासी व्यवसायी कुंवर संजय सिंह और पेशे से डेंटिस्ट दून के डालनवाला निवासी डा. प्रशांत सिंह की है। दोनों 17 साल से अपने खर्च पर आदमखोरों का शिकार कर रहे हैं। संजय ने बताया कि उनके परिवार में शिकार की परंपरा रही है।
दादा-परदादा जंगलों में शिकार करने जाया करते थे, बचपन में वह भी दादा संग निकल जाते थे। 80 के दशक में शिकार पर प्रतिबंध लगा तो परिजनों ने बंदूकें दीवारों पर टांग दीं। लेकिन उनका शौक खत्म नहीं हुआ। ऐसे में उन्होंने आदमखोरों के खौफ में जी रहे लोगों की मदद के लिए बंदूक उठा ली। बताया कि प्रशांत उनके परिचित हैं, उन्हें भी शिकार का शौक था। लिहाजा दोनों साथ हो गए। जहां भी आदमखोर की खबर मिलती, वह वहां पहुंच जाते।
पहला शिकार 1998 में किया
दो जनवरी 1998 को अल्मोड़ा के धौलादेवी में उन्होंने अपना पहला आदमखोर शिकार किया। इसके बाद लैंसडौन में दो और हरिद्वार में एक आदमखोर को ढेर किया। वर्ष 2010 में उन्होंने झाझरा में ही आदमखोर मारा।
नवंबर 2013 में धौलास में उन्होंने आदमखोर को मारा था। दोनों अब तक दस गुलदार मार चुके हैं। लेकिन उन्हीं गुलदारों का शिकार किया जाता है, जो वन विभाग द्वारा आदमखोर घोषित किए गए हों।
संजय तक ही चलेगी परंपरा
कुंवर संजय सिंह ने बताया परिवार की शिकार की परंपरा उन तक ही चलेगी। नई पीढ़ी में इस ओर कोई रुझान नहीं है। बताया कि बेटा विशाल आस्ट्रेलिया से एमबीए कर रहा है, लेकिन वह शिकार के नाम से ही दूर भागता है। उसका कहना है कि बेजुबानों की जान मत लो, उनकी जान बचाओ।
दो बजे चलाते थे सर्च अभियान
आदमखोर का शिकार आसान नहीं था। वन विभाग और शिकारियों की टीम सतर्कता से काम को अंजाम देने में लगी थी। रात दो-दो बजे तक जान से खेलकर जंगल में सर्चिंग अभियान चलाना। हाड़ कंपाने वाली ठंड में मचान पर बैठना मौत से खेलने से कम नहीं था।
शिकारी टीम के लीडर कुंवर संजय सिंह ने बताया कि आबादी की वजह से होने वाला हो-हल्ला सबसे बड़ी मुसीबत था। पहले दिन जब मिशन असफल रहा तो इसकी प्रमुख वजह ग्रामीणों की ओर से शोर मचाना और पटाखे फोड़ना था। बावजूद इसके आदमखोर को मारना उन्होंने चुनौती की तरह लिया।
शाम चार बजे से मचान पर तैनात होने के बाद न खाने का पता न पीने का। सावधान और सतर्क निगाहें मचान के नीचे कुछ दूरी पर बंधे बकरे के इर्द-गिर्द होती थीं। जब गुलदार नहीं आता तो नीचे उतरकर सतर्कता से सर्च अभियान चलाते। बुधवार और बृहस्पतिवार को बारिश की वजह से अभियान में व्यवधान पड़ा।
तीन रेंज के वनकर्मी लगे थे अभियान में
एसडीओ गुलवीर सिंह ने बताया कि उनकी तीन रेंज की टीमें अभियान में लगाई गई थी। मालसी रेंज, झाझरा रेंज और आसारोड़ी रेंज के वनकर्मियों को शिफ्ट में ड्यूटी पर लगाया गया था, ताकि शिकारियों का हौंसला भी बढ़ा रहे और काम भी हो जाए।
आबादी पर निर्भर हो गए गुलदार
शिकारी कुंवर संजय सिंह ने बताया कि गुलदार का बार-बार आबादी में आना कोई अचरज की बात नहीं है। दरअसल, गुलदार के लिए भोजन का संकट सबसे बड़ी परेशानी है। गुलदार का 80 प्रतिशत भोजन केवल आबादी में रहने वाले कुत्तों, गाय, सूअर और बकरी पर निर्भर हो गया है। इस वजह से जब वह आबादी में कुत्तों का शिकार करने आते हैं तो इंसान भी उनका शिकार हो जाते हैं। अगर आदमखोर से निजात पानी है तो गुलदार के भोजन का संकट दूर करना होगा।
तीन आदमखोर मरवा चुका है गजेंद्र
आदमखोर के आने की सूचना मिलते ही उन्हें कुलबुलाहट होने लगती है। उसका शिकार करवाने के लिए वह तैयार हो जाते हैं। फुलसनी में शुक्रवार को जब आदमखोर मारी गई तो उनके चेहरे पर अलग ही सुकून नजर आया।
वन विभाग की झाझरा रेंज में संविदा पर तैनात गजेंद्र पैन्यूली इस अभियान का अहम हिस्सा थे। गजेंद्र ने बताया कि इससे पहले दो और आदमखोर को मारने में वह शिकारियों की टीम का साथ दे चुके हैं। रोडवेज से रिटायर्ड गजेंद्र के लिए आदमखोर के शिकार अभियान का हिस्सा बनना शौक है। शुक्रवार शाम झाझरा रेंज में कोने में खड़े गजेंद्र अपनी एक और जीत पर संतुष्ट नजर आए।