लता जी की रूहानी आवाज सिनेमा के रुपहले पर्दे पर पहाड़ के खूबसूरत नजारों में हमेशा चार चांद लगा दिए। चाहे श्वेत-धवल हिम के मुकुट पहने शीश ताने गर्वीले पहाड़ हों, झर-झर बहते झरने हों, कल-कल बहती नदी हो, बांह फैलाते देवदार हों अथवा सिकुड़ता-सहमता चीड़ हो, वी का आकार बनाती गहरी घाटियां हों उनके गीत उनमें खूबसूरती टांक देते थे।
लता जी की आवाज में प्रेम पर्बत का वह गीत सुन लीजिए इसकी तो धुन भी पहाड़ी है...ये दिल और उनकी निगाहों के साये....पहाड़ों को चंचल किरन चूमती है....हवा हर नदी का बदन चूमती है। शहद में घुला पहाड़ का पूरा रोमानीपन सुर बनकर झरने की तरह फूट पड़ता है।
चाहे मधुमती का गीत हो आजा रे परदेसी....मैं तो कबसे खड़ी इस पार कि अंखियां थक गईं पंथ निहार में पूरा पहाड़ ही दिखता है। कितनी फिल्मों का नाम लें..जिस देश में गंगा बहती है का वो गीत सुन लीजिए जिसमें पहाड़ का दर्द ओ बसंती पवन पागल ना जा रे ना जा और हिमालय की गोद का सीढ़ीनुमा खेतों के बीच फिल्माया ..एक तू जो मिला में पहाड़ की खूबसूरती गीत से उभर कर सामने आती हैं।
नूरी में कश्मीर और कुदरत में हिमाचल का सौंदर्य लता के गीतों के नेपथ्य में था। इन गीतों में उनकी मीठी आवाज शहद के झरनों की मानिंद वादियों में गूंजती रहती। श्रोताओं पर एक जादू सा छा जाता। वह इन गानों को सुनकर मदहोशी के आलम में चले जाते। गढ़वाली फिल्म रैबार में भी एक गीत गाकर लता जी ने पहाड़ को आशीष दिया था।