सतीश जोशी के मोबाइल फोन की घंटी बजी, उन्होंने हैलो के बजाए हरिओम कहा। फिर वह एक दुकान में गए उनको आटे की जरूरत थी। दुकानदार से पूछा गोधूम चूर्णम अस्ति।
दुकानदार समझा नहीं तो सतीश ने आटे के थैले पर अंगुली लगा दी। सतीश ने प्रण लिया है कि वह किसी भी दशा में संस्कृत के अलावा अन्य भाषा नहीं बोलेंगे। हालांकि इस वजह से उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
उनका संस्कृत ज्ञान हैरत में डालने वाला है। उनके साथी मुकेश कोहली ने भी संस्कृत में पारंगत हासिल कर ली है। मुकेश ने पिथौरागढ़ कॉलेज से पहले बीएससी किया। बाद में उन्होंने एमए हिंदी में प्रवेश ले लिया। संस्कृत भारती के शिविरों में जाकर उनका भी संस्कृत के प्रति मोह जागा। अब यह 25 वर्षीय नौजवान धाराप्रवाह संस्कृत बोल लेता है।
तीन महीने में संस्कृत भाषा सीखी
सतीश जोशी (21) मूल रूप से चंपावत जिले के ब्यानधुरा के रहने वाले हैं। उनके पिता महेश जोशी ब्यानधुरा मंदिर के पुजारी हैं।
सतीश ने हरिद्वार से उत्तर मध्यमा तक की शिक्षा ली और संस्कृत भारती से जुड़ने के मात्र तीन महीने में संस्कृत भाषा सीख ली। जब उनको संस्कृत शिक्षक की जिम्मेदारी मिली तो उसी समय उन्होंने किसी भी परिस्थिति में संस्कृत भाषा ही बोलने का संकल्प ले लिया।
सतीश ने बताया कि वह पिथौरागढ़ जिले में 250 लोगों को फर्राटा संस्कृत बोलने वाला बनाने का लक्ष्य लेकर आए हैं।
आपस में बोलते हैं संस्कृत
सतीश एक गांव को संस्कृत ग्राम बनाएंगे। वहीं मुकेश कोहली ने कहा कि आज की नौजवान पीढ़ी अंग्रेजियत की तरफ भाग रही है। कुमाऊंनी बोलने में शर्म में महसूस करती है।
संस्कृत भाषा संस्कार देती है और यह जीवन में आगे बढ़ने में मदद करती है। मुकेश के अनुसार उनके पांच अन्य साथी भी धाराप्रवाह संस्कृत बोलते हैं।
मुकेश कोहली और सतीश जोशी जब कहीं एक साथ सफर पर जाते हैं तो दोनों आपस में संस्कृत भाषा में ही वार्तालाप करते हैं। सतीश ने तो जीवनभर संस्कृत बोलने का संकल्प लिया है।
मुकेश भी उनके साथ संस्कृत में ही बोलता है। यह दोनों नौजवान संस्कृत में बोलते हैं तो लोगों को सुखद आश्चर्य होता है।