फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

खतराः हिमालयी रेंज में तेजी से बढ़ रहा भूस्खलन

Sat, 04 Jul 2015 08:03 AM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
विज्ञापन
इंडियन और यूरेशियन प्लेट के टकराने से हिमालय तो ऊंचा हो रहा है लेकिन इससे हिमालयी रेंज में हलचल मची है।
विज्ञापन


भूस्खलन की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। जियोलोजिकल सर्वे आफ इंडिया (जीएसआई) की ताजा सेटेलाइट इमेजरी सर्वे रिपोर्ट आने के बाद यह तथ्य उजागर हुआ है। इस पर जीएसआई ने इन क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए नया रोड मैप तैयार करना शुरू कर दिया है।

इसके साथ ही जीएसआई रक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर सर्वे आफ इंडिया के बताए चुनिंदा 25 स्थानों की चट्टानों, मिट्टी की जांच शुरू कर दी है। यहां इंक्लोनोमीटर लगाए जाएंगे जिससे पहाड़ों के अंदर की हलचल पहले पता लग जाएगी। जीएसआई की एक दर्जन टीमों ने हिमालयी क्षेत्र का अलग-अलग मानचित्रण किया है।
विज्ञापन


इसमें पाया गया कि जब से इंडियन और यूरेशियन प्लेट में टकराहट शुरू हुई तो दबाव से हिमालय ऊंचा उठने लगा लेकिन इसके प्रभाव से हिमालयी रेंज में हर तरफ भूस्खलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है।

उन क्षेत्रों में भूस्खलन हो रहा है जहां ऐसी घटनाएं कम होती हैं। सर्वे विज्ञानियों का कहना है कि हिमालय ऊंचा होने के दबाव से पर्वतमालाओं के अंदरूनी हिस्सों में दबाव बढ़ गया है जिससे मिट्टी की परतें खिसक रही हैं।
विज्ञापन

पीछे खिसक रहे हैं ग्लेशियर

प्लेटों के टकराने से जलवायु पर भी फर्क आ रहा है। ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं। इसने हिमालयी रेंज में भूस्खलन की प्रक्रिया को और तेज कर दिया है। जीएसआई ने रक्षा मंत्रालय के साथ भूस्खलन के मामले में काम तेज कर दिया है।

इंक्लोनोमीटर लगाने के लिए मसूरी, नरेंद्र नगर और शेर का डांडा, नैनीताल फाइनल कर दिए गए हैं। इसके अलावा सर्वे आफ इंडिया के बताए 22 अन्य स्थानों पर वर्षा चट्टानों और मिटटी के प्रकार की जांच की जा रही है। रिपोर्ट आने के बाद इन स्थानों को फाइनल किया जाएगा।

हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। नए रोड मैप से विकास कार्य कराने में आसानी होगी। उन क्षेत्रों को अवॉय्ड किया जा सकेगा जहां भूस्खलन का अधिक खतरा है। रक्षा मंत्रालय के साथ इंक्लोनोमीटर भी लगाए जा रहे हैं जिससे भूस्खलन का पहले से अंदाजा लग सकेगा। इसके लिए नया सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किया जा रहा है।
- डॉ. विनोद कुमार शर्मा, निदेशक, जीएसआई

विज्ञानियों का कहना है कि  भूस्खलन होने में डेढ़ दो घंटे से लेकर दो-तीन दिन तक लग जाते हैं। इंक्लोनोमीटर 30 मीटर का होगा। इसे मिट्टी में डाल दिया जाएगा। एक-एक मीटर पर तीन सेंसर लगेंगे।

मिट्टी की परतों पर जैसे ही हलचल होगी सेंसर अलर्ट कर देगा। इसके बाद शासन-प्रशासन और लोकल अथॉरिटी को भी अलर्ट चला जाएगा। भूस्खलन के पहले ही बचाव कार्य हो सकेगा।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें