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नसबंदी के बदले मिली जमीन सरकार ने छीनी

Mon, 04 Nov 2013 09:41 PM IST
शेषमणि शुक्ल/ अमर उजाला, देहरादून
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मारखम ग्रांट, डोईवाला में एसएसबी को जमीन देने के लिए प्रदेश सरकार ने दो सौ परिवारों को भूमिहीन बना दिया है। नसबंदी कराने के बदले 1976 में सरकारी योजना के तहत इन परिवारों को कृषि कार्य के लिए जमीन के पट्टे मिले थे। पट्टाधारकों का आरोप है कि प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन ने बगैर उन्हें सूचित किए पट्टे निरस्त कर जमीन एसएसबी को दे दी।
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सरकार के काट रहे चक्कर
मारखम ग्रांट की जो जमीन एसएसबी को दी गई, उसमें से 38 एकड़ के करीब ग्राम समाज की भूमि है। इसी जमीन पर लोगों के पट्टे हैं। गुलाम साबिर, गयासुद्दीन, इसरार अली, नईम अंसारी, अबरार, नौशाद अली, अली हसन, समेत दो सौ पट्टाधारक जमीन बचाने को शासन और सरकार में चक्कर काट रहे हैं। इनका कहना है कि उनके पट्टे निरस्त करने की जानकारी उन्हें तब मिली, जब एसएसबी के कुछ जवान पिछले दिनों उनके खेत पर दिखाई दिए।

इनका आरोप है कि जवानों ने उन्हें जमीन पर खेती करने से रोका और धमकाया। जबकि जमीन पर अभी भी पट्टेधारकों का ही कब्जा है। उन्होंने बताया कि जुलाई में राजस्व सचिव को दिए एक आवेदन में उन्होंने संबंधित भूमि को वर्ग-1 में दर्ज करने का आवेदन भी दिया था। उस दौरान भी उन्हें पट्टा निरस्त करने की कोई जानकारी नहीं दी गई।
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पट्टे छिन रहे
यह भी इत्तेफाक है कि प्रदेश सरकार एक तरफ आसामी पट्टों को नियमित करने की कार्रवाई कर रही है। दूसरी तरफ लोगों के पट्टे छिन रहे हैं। इन पट्टाधारकों में पचास से ज्यादा गरीब मुस्लिम परिवार हैं। इन लोगों ने पिछले दिनों केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत से भी मिल कर अपनी बात कही। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से भी मिलना चाहा। इनका कहना है कि 1976 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीस सूत्री कार्यक्रम के तहत नसबंदी कराने पर ये पट्टे उन्हें आवंटित हुए थे।

रोजी-रोटी का संकट
यह परिवार इन जमीनों पर खेती कर परिवार का भरण-पोषण करता आ रहा है।पट्टाधारकों का कहना है कि जमीन छिन जाने से उनके परिवार के सामने रोजी-रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। उन्होंने सरकार से इन पट्टों के एवज में खेती लायक दूसरी जमीन देने, भूमि अधिग्रहण नियम के तहत मुआवजा देने और प्रत्येक पट्टाधार को स्थायी रोजगार मुहैया कराने की मांग की है।
 
यह प्रकरण मेरे कार्यकाल के पहले का है। एसएसबी को दी गई जमीन पर लोगों के पट्टे की जानकारी जुटानी पड़ेगी। कभी किसी ने मुझसे इस बारे में संपर्क भी नहीं किया। अब अचानक यह प्रकरण सामने आ रहा है। दिखवाता हूं।-वीवीआरसी पुरुषोत्तम, जिला अधिकारी देहरादून

आसामी पट्टे पांच-पांच साल के लिए होते हैं। बाद में उनका नवीनीकरण (रिन्यू) होता रहता है। जिन पट्टों की बात आ रही है, उनकी अवधि पूरी हो चुकी थी। संतोष बड़ोनी, अनुसचिव, राजस्व विभाग
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