राजधानी देहरादून में औने-पौने भमि हथियाने में माहिर भूमाफिया अब बिजनेस माइंडेड हो गए हैं। जमीन के कारोबार के साथ ही रियल इस्टेट की रियल्टी भी उनके समझ में आ गई है।
ऐसे में भूमाफिया सरकारी योजनाओं की आड़ में धंधा चमकाने में लग गए हैं। प्लाटिंग के बाद जमीन की मुंहमांगी कीमत वसूलने के इरादे से वहां योजनाओं को लागू कराने के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। इस खेल में नेता और अफसर भी उनका साथ दे रहे हैं।
रियल इस्टेट के क्षेत्र में माफियाओं ने पूरी प्लानिंग के साथ खेल किया है। सालों पहले उन्होंने जमीनों को औने-पौने दामों पर ले लिया।
खासतौर पर वे ऐसी जमीनों पर काबिज हुए हैं जहां विरोध करने वाले निहायत ही कमजोर हों। यहां फर्जी दस्तावेजों का भी खूब इस्तेमाल किया गया।
107 बीघा जमीन कब्जा ली
गंगोल पंडितवाड़ी का ही मामला ले लीजिये, यहां भूमाफियाओं ने कई साल पहले 107 बीघा जमीन कब्जा ली थी। कमिश्नर को दिए गए शिकायती पत्र के मुताबिक 26 अगस्त 1975 को सहारनपुर के महेंगाराम पुत्र करतार सिंह को यह भूमि आवंटित की गई थी।
26 साल के बाद महेंगाराम की पत्नी भिमदेई को लाकर 20 हजार में जमीन लिखा ली गई। इसके बाद भूमाफियाओं ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए कई लोगों से इस जमीन का सौदा कर लिया। 6 मई 2002 को इसकी शिकायत तहसीलदार सदर से भी की गई थी।
नेताओं और अफसरों की मिलीभगत
भूमाफियाओं ने इस जमीन की प्लाटिंग कर दी और दांवपेंच लगाकर यहां नदी पर पुल पास करा लिया। अब इस मामले की बाकायदा जांच हो रही है। अभी ऐसे बहुत से मामले पड़े हैं जिनके संबंध में शासन-प्रशासन को पता तो है लेकिन जांच नहीं की जा रही है।
कुछ नेताओं और अफसरों की मिलीभगत के कारण मामले दबा दिए जाते हैं। विकासनगर, सहस्त्रधारा रोड, नालापानी समेत बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां भूमाफियाओं का जाल फैल रहा है।
बस्तियों में होने वाले ज्यादातर विकास कार्यों को वे अपने प्लाटिंग वाले स्थानों में कराना चाहते हैं जिससे कीमतों में भारी उछाल आ जाए।