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उत्तराखंड : केदारनाथ हो या रैणी आपदा, खतरा अभी टला नहीं, करने होंगे दूरगामी इंतजाम

Thu, 17 Jun 2021 01:41 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal आफताब अजमत, अमर उजाला, देहरादून

सार

आपदाओं का सिलसिला और वैज्ञानिकों के अंदेशे यह बयां कर रहे हैं कि खतरा अभी टला नहीं है। आपदाएं लगातार तबाही लेकर आती रहेंगी, बशर्ते कि हम इससे बचाव के लिए दूरगामी इंतजाम करें।
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तपोवन बांध (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार
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केदारनाथ आपदा के बाद कई कमेटियां बनीं। विशेषज्ञों ने अध्ययन किए। उन्होंने लंबी-चौड़ी सिफारिशें दीं। लेकिन उन सिफारिशों पर गंभीरता से अमल नहीं किया जा रहा। वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों का एक सुर में कहना है कि केदारनाथ, बदरीधाम, गंगोत्री-यनुनोत्री जैसे पवित्र स्थल अत्यंत संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं।

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केदारनाथ की आपदा हो या हाल ही में चमोली के रैणी में आई आपदा। आपदाओं का सिलसिला और वैज्ञानिकों के अंदेशे यह बयां कर रहे हैं कि खतरा अभी टला नहीं है। आपदाएं लगातार तबाही लेकर आती रहेंगी, बशर्ते कि हम इससे बचाव के लिए दूरगामी इंतजाम करें।

भौगोलिक रूप से, हिमालय युवा और अस्थिर पर्वत है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जिओलॉजी के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2017 में केंद्र और राज्य सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें हिमालय क्षेत्र में अंधाधुंध तरीके से स्थापित हो रहे ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्टर प्रोजेक्ट पर रोक लगाने का सुझाव दिया गया था।

सुझाव पर कितना अमल हुआ, यह अलग बात है, लेकिन वैज्ञानिकों की आशंकाएं हर साल कोई न कोई कड़वा सच जरूर लेकर आ रही हैं। इतना जरूर है कि सरकार ने पहले ग्लेशियरों के अध्ययन के लिए जिस सेंटर की स्थापना की थी, उसे पिछले वर्ष बंद कर दिया गया। अब वैज्ञानिक तौर पर हम हिमालय की आपदाओं का कितना आकलन और पूर्वानुमान कर सकेंगे, यह बड़ा सवाल है।

ग्लेशियोलॉजी सेंटर के सुझावों को किया दरकिनार

इससे पूर्व वर्ष 2002 में योजना आयोग ने हिमालयन ग्लेशियर्स पर एक सब कमेटी का गठन किया था। इस सब कमेटी ने उत्तराखंड में एक ग्लेशियोलॉजी सेंटर स्थापित करने का सुझाव दिया था, जो कि ग्लेशियोलॉजी के क्षेत्र में आगे चलकर एक बड़ी अनुसंधान संस्था के रूप में जाना जाएगा। तत्कालीन केंद्र सरकार ग्लेशियल हाइड्रोलॉजी, मास बैलेंस, ग्लेशियल डायनामिक्स, ग्लेशियल हैजर्ड के साथ इंटीग्रेटेड ग्लेशियल प्रोसेस के क्षेत्र में एक रिसर्च कराना चाहती थी।

इस कमेटी ने ग्लेशियोलॉजी के क्षेत्र में एक निगरानी स्टेशन की स्थापना का सुझाव दिया था, जिससे कि हाई क्वालिटी डेटा प्राप्त किया जा सके। उस समय देश में ग्लेशियोलॉजी के क्षेत्र में काम करने वाला कोई विशेष संस्थान नहीं था। दुर्भाग्य की बात है कि इस योजना पर अमल नहीं किया गया।

इसके बाद जून 2008 में केंद्र सरकार ने नेशनल एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज(एनएपीसीसी) लांच किया था। इसमें आठ मिशन शामिल थे, जिनमें से नेशनल मिशन फॉर सस्टेनेबल हिमालयन इको सिस्टम भी एक था।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने तय किया था कि दून और मसूरी के क्षेत्र में सेंटर फॉर ग्लेशियोलॉजी की स्थापना होगी। शुरुआत में वाडिया इंस्टीट्यूट इसकी निगरानी करेगा और बाद में नेशनल सेंटर फॉर हिमालयन ग्लेशियोलॉजी के रूप में विकसित हो जाएगा।
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2020 में बंद कर दिया गया ग्लेशियोलॉजी सेंटर

जिस सेंटर फॉर ग्लेशियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने 2017 में हिमालय में आई बाढ़ की विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी। इस रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने हिमालय क्षेत्र में नए ऊर्जा प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दिए जाने के फैसलों पर चिंता जताई थी। उस सेंटर को सरकार ने वर्ष 2020 में बंद कर दिया। 

उत्तराखंड में हैं करीब 968 ग्लेशियर
देश में करीब 10 हजार ग्लेशियर हैं और उत्तराखंड में इनकी संख्या 968 है। हिमालय विश्व की सबसे नवीनतम पर्वत श्रृंखला मानी जाती है, लिहाजा इसके बनने-बिगड़ने की प्रक्रिया अभी जारी है। यही कारण है कि समूचा हिमालय बेहद संवेदनशील है।

ऐसे में उच्च पर्वत श्रृंखलाओं में मौजूद ग्लेशियरों की संवेदनशीलता और बढ़ जाती है। खासतौर पर जबकि इन क्षेत्रों में विकास कार्यों ने भी गति पकड़ी है और यह समय की मांग भी है। निरंतर भूगर्भीय हलचलों के साथ ग्लोबल वार्मिग से ग्लेशियरों के पिघलने की दर बढ़ गई है। परिणामस्वरूप ग्लेशियर में झीलों के फटने और एवलांच की घटनाएं सामने आ रही हैं।

अभी भूले नहीं हैं रैणी आपदा के जख्म
सात फरवरी 2021 को ऋषिगंगा में आई आपदा के चलते रैणी, तपोवन क्षेत्र में व्यापक नुकसान हुआ था। रैणी गांव के कई ग्रामीण भी आपदा का शिकार बन गए थे, जबकि अधिकतर भवनों में दरार पड़ गई थी।

इधर, चमोली जिले में बारिश के बाद ऋषिगंगा व धौलीगंगा नदी का जल स्तर भी लगातार बढ़ रहा है। इससे इन नदियों के किनारे बसे रैणी के ग्रामीणों की परेशानियां बढ़ गई है। ऐसे में ग्रामीण खतरे की आशंका को लेकर रातभर जाग रहे हैं। इन आपदा और इसके बाद के हालात आज भी दुख देते हैं।
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