फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शिव बनकर सालों से साजिद कांवड़ लेने आता है हरिद्वार

Sun, 20 Jul 2014 09:20 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, रुड़की/ हरिद्वार
विज्ञापन
विज्ञापन
कजावला दिल्ली निवासी मोहम्मद साजिद अली खान पिछले 10 वर्षों से भोले का रूप धारण कर कांवड़ लेने हरिद्वार आ रहे हैं। हरिद्वार से गंगा जल लेकर जब यह 14 वर्षीय कांवड़िया रुड़की पहुंचा तो उसे देखने के लिए शिवभक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी।
विज्ञापन


नए पुल के पास चल रहे कांवड़ सेवा शिविर में साजिद ने शिव तांडव रूपी नृत्य कर लोगों का मन मोह लिया। साजिद के पिता मोहम्मद सलीम दिल्ली में संगीत एकेडमी चलाते हैं।

बेटे के साथ आए सलीम ने बताया कि चार साल की उम्र से ही साजिद कांवड़ लेने आ रहा है। उनके पास हिंदू परिवार के कई बच्चे संगीत सीखने आते थे।

दिल्ली से आने वाले कांवड़ियों के दल के साथ साजिद हर साल कांवड़ लेने आता है। श्री गणेशधाम मंदिर सेवा समिति के अध्यक्ष आदेश सैनी और महामंत्री विनिल सिंघल आदि पदाधिकारियों ने साजिद और उसके दल में शामिल अन्य शिवभक्तों का स्वागत किया।
विज्ञापन

यह हैं ग्रेटर नोएडा के आधुनिक श्रवण कुमार

सावन के माह में कांवड़ यात्रा का जोर है। इस दौरान कई अनोखे दृश्य भी नजर आते हैं।

कुछ ऐसे हैं, जो बीते जमाने की बात बन चुके हैं। ग्रेटर नोएडा के परशुराम ने ऐसा ही एक दृश्य प्रस्तुत किया है। कांवड़ में गंगाजल के साथ उसने बूढे़ मां-बाप को भी बैठा लिया है।

त्रेता युग में श्रवण कुमार ने मातृ-पितृ भक्ति का जैसा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया था, वैसा ही परशुराम भी कर रहा है।

माता-पिता के लिए बनाई विशेष पालकी

संयोग यह कि परशुराम एक बार नहीं बल्कि हर वर्ष ही श्रावण मास में अपने माता-पिता को कांवड़ की यह यात्रा करता है। यात्रा के लिए उसने एक विशेष पालकी बनाई है।

इस पालकी में बूढे़ माता-पिता विराजमान रहते हैं। उनके साथ हरकी पैड़ी से भरा गया गंगाजल रखा रहता है।

इस पालकी को वह खींचते हुए ग्रेटर नोएडा तक ले जाता है, जहां भगवान शिव का जलाभिषेक माता-पिता के साथ प्रतिवर्ष करता है।
विज्ञापन

गंगा मैया और माता-पिता के प्रति श्रद्घा

जिस पालकी में परशुराम माता-पिता को कांवड़ यात्रा करता है, वह पालकी उसने खुद ही तैयार की है।

मूल रूप से अब नोएडा में समा चुके एक गांव का रहने वाला परशुराम छोटे-मोटे काम कर जीवन यापन करता है। गंगा मैया और माता-पिता के प्रति उसकी श्रद्धा असीम है।

यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष कांवड़ यात्रा के दौरान परशुराम मां-बाप को पालकी में ले जाता है। उसे वर्तमान युग का श्रवण कुमार न कहें तो भला क्या कहें।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें