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कैलास मानसरोवर यात्रा के बारे में जानें सबकुछ

Mon, 03 Mar 2014 01:33 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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भगवान आशुतोष के धाम की महिमा के क्या कहने। दिव्य, अलौकिक, साक्षात स्वर्ग की अनूभूति कराने वाले हिममंडित पर्वत शिखर कैलास पर भोले भंडारी का स्थायी निवास है।
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मान्यता है कि महायोगी शिव यहां अनंत काल से मौन साधना में लीन हैं। काले पत्थरों से निर्मित सदैव हिममंडित रहने वाले कैलास को स्वयंभू और सभी ज्योतिर्लिंगों ने सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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कपिल मुनि के श्राप से दग्ध अपने साठ हजार पितरों को तारने के लिए इच्छाकुवंशी (इसी कुल में भगवान राम पैदा हुए थे) राजा भगीरथ की तपस्या से अपने अलकजालों से गंगा को मुक्त किया था।
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उसी की एक धारा मानसरोवर के रूप में यहां विद्यमान है। यहीं कुबेर की अलकापुरी भी स्थित है। हिंदुओं के लिए ही नहीं, यह बौद्धों, जैनियों और तिब्बतियों का भी अत्यंत पवित्र तीर्थ माना जाता है।

इस स्थान तक पहुंचना है कठिन

भौगोलिक रूप से इस स्थान तक पहुंचना कठिन तो है लेकिन यह इतना मनोरम कि एक बार यहां पहुंच कर सारी शिथिलता और श्रम दूर होता है। धार्मिक आख्यानों में मामूली संकट होने पर देवताओं के शिव की शरण में कैलास जाने का वर्णन मिलता है।

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रावण, भस्मासुर जैसे महान शिवभक्त यहां तपस्या करके शंकर को प्रसन्न कर वरसंपन्न होते रहे हैं। पुराणों और दूसरे धर्मग्रंथों में अति प्राचीन काल से भगवान शिव के भक्तों द्वारा कैलास यात्रा का वर्णन मिलता है।

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बौद्ध, जैन धर्म का भी पवित्र स्थल होने की वजह से कैलास दर्शन के लिए इन मतावलंबियों का भी काफी प्राचीन काल से आना-जाना रहा है। जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की तो कैलास निर्वाण स्थली मानी जाती है।

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बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए तिब्बत की सैर और कैलास क्षेत्र के भ्रमण की सुदीर्घ परंपरा रही है।

ये हैं यात्रा के मुख्य धार्मिक पड़ाव

राक्षसताल
गुर्लामांधाता पर्वत की घाटियों से होते हुए यात्री राक्षसताल पहुंचते हैं। यह ताल 84 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसकी गहराई 150 फुट है।

पुराणों के अनुसार राक्षसों के राजा रावण ने यहीं बैठ कर भगवान को प्रसन्न किया था। मानसरोवर से 45 किलोमीटर दूर तारचेन में कैलास परिक्रमा का आधार शिविर है। यहीं से कैलास परिक्रमा आरंभ होती है।

मानसरोवर
विश्व में सर्वाधिक ऊंची (17 हजार फुट) 120 किलोमीटर के दायरे में फैली मीठे पानी की झील मानसरोवर आश्चर्य से कम नहीं है। इसकी गहराई तीन सौ फुट है। शिव की जटाओं से निकलने की मान्यता की वजह से इसके जल को अत्यंत पवित्र माना जाता है।

डेरापुफ
तारचेन से यात्री यमद्वार पहुंचते हैं। यहां से घोडे़ और याक पर चढ़कर ब्रह्मपुत्र नदी को पार करके कठिन रास्ते से होते हुये यात्री डेरापुफ पहुंचते है। जहां ठीक सामने कैलास के दर्शन होते हैं। डेरापुफ में श्रद्धालु रात्रि विश्राम करते हैं।

डोल्मा
कैलास मार्ग पर ड्रोल्मा साढे़ 19 हजार फुट खड़ी ऊंचाई पर स्थित है। ड्रोल्मा में ही शिव और पार्वती की पूजा-अर्चना करके धर्म पताका फहराई जाती है।

गौरीकुंड
ल्हादू घाटी स्थित 18400 फुट की ऊंचाई पर गौरीकुंड झील स्थित है। इसका पानी बिलकुल हरे पन्ने के रंग का है।

मान्यता है कि साढे़ सात किलोमीटर के दायरे में फैली 80 पुट गहराई वाली इसी झील में रहकर माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने केलिए घोर तपस्या की थी।

इन परेशानियों से हो सकता है सामना

यात्रा मार्ग की कठिनाई के अलावा आक्सीजन की कमी स्वास्थ्य, सहूलियतों की कमी, खानपान, संचार आदि की समस्याओं से दोचार होना पड़ता है।

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उच्च रक्तचाप, चक्कर आना, सांस फूलना, सुस्ती अथवा अनिद्रा से भी यात्री परेशान रहते हैं। इसके लिए यही सलाह है कि यात्री क्रमश: चढ़ाई चढ़ें।

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इस साल संचार केलिए केंद्र ने हर दल के साथ एक सेटेलाइट फोन की व्यवस्था की है। इससे यात्री दल का संवाद बने रहने की उम्मीद है।

यात्री इन बातों का रखें ध्यान

स्वास्थ उत्तम होना चाहिए। आपको प्रतिदिन देर तक पैदल टहलने की आदत होनी चाहिए। नशा बिलकुल न करें। आम धारणा के विपरीत ऊंचे पहाड़ों में अल्कोहल का प्रयोग घातक है।

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मानसरोवर और कैलास यात्री हमेशा समूह में ही रहें जिससे किसी को भी किसी तरह की परेशानी हो तो उस दल के अन्य सदस्य उसकी मदद कर सके।

ये जरूरी चीजें साथ रखें
बुखार, सिर दर्द, जुकाम, बदन दर्द, पेट दर्द, डायरिया, उल्टी-दस्त की दवाएं साथ रखें। मल्टी विटामिन्स गोलियां, वैसलीन, बैंड एड, चाकलेट, टाफियां, धूप के चश्मा अवश्य साथ रखें।  

ये कपड़े जरूरी
पर्याप्त गर्म कपड़े, ऊनी मोजे. जैकेट, दस्ताने, अच्छी क्वालिटी के जूते जरूर रखें। जिससे ठंड से मुकाबला किया जा सके।   कपड़ों की संख्या से ज्यादा क्वालिटी पर ध्यान दें।

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ज्यादा जोड़ियां न ही रखें तो अच्छा। क्योंकि यात्रा के दौरान आपको कपड़े बदलने के बहुत मौके नहीं मिलेंगे। ठंड इतनी ज्यादा होगी कि जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

जानें...यात्रा कब, कहां

पहले दिन
सुबह छह बजे से दिल्ली से अल्मोड़ा एसी बस द्वारा, दिल्ली में विदेश मंत्रालय के अफसर यात्रा के बारे में संक्षिप्त जानकारी देते हैं।

दूसरे दिन
अल्मोड़ा से वाया कौसानी चौकोरी के लिए प्रस्थान

तीसरे दिन
चकौरी से वाया डीडीहाट धारचूला यहां आटीबीपी के कैंप हेडक्वार्टर मेरठी में यात्रियों का स्वागत होता है उन्हें यात्रा के बारे में बताया जाता है।

चौथा दिन
धारचुला से सिरखा, यहां नारायण स्वामी आश्रम प्रमुख स्थल है।

पांचवां दिन
सिरखा से गाला

छठा दिन
गाला से बुधि तक, 18 किमी का थका देने वाला ट्रैक, लामड़ी गांव में विश्राम और चायपान की व्यवस्था।

सातवां दिन
बुधि से गुंजी

आठवां दिन
गुंजी में विश्राम, आटीबीपी की टीम मेडिकल चेकअप के बाद फिटनेस की जांच करेगी। इसके बाद ही आपको आगे यात्रा की इजाजत मिलेगी।

नवां दिन
गुंजी से कालापानी होते हुए नाभिढांग, आईटीबीपी टीम और उसके डाक्टर तिब्बत सीमा की ओर ले जाएंगे जहां से यात्रा दल चीनी अधिकारियों के हवाले होगा।

दसवां दिन
लिपूलेख से तकलाकोट, तकलाकोट बौद्धों का प्राचीन शहर है। यहां कई गोम्पा और बौद्ध मंदिर मिलेंगे।

बारहवें दिन से 19वें दिन
कैलास परिक्रमा में यात्री बस द्वारा तकलाकोट से दारचेन तक ले जाए जाते हैं। दारचेन कैलास परिक्रमा का बेस कैंप है। दारचेन के बारखा मैदान से कैलास की 48 किमी की परिक्रमा प्रारंभ होती है।

यहां से गुजरती है परिक्रमा

डेराफुक तक बस से यमद्वार, इसके बाद फिर ट्रैकिंग के जरिए डोल्मा पास, गौरीकुंड, जोंगजेरबु, दारचेन, अष्टपाद यहां कैलास की परिक्रमा पूरी होती है। इसके बाद यात्री लौटने लगते हैं?

अब प्रतिबंधों के साथ होती है कैलास यात्रा
कैलास मानसरोवर का अतीतकाल से ही धार्मिक महत्व रहा है। कैलास को भगवान शंकर का वास माना गया है।

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इसी कारण हर साल बड़ी संख्या में हिंदू कैलास पर्वत के दर्शनों को जाते हैं। कैलास पर्वत के पास स्थित मानसरोवर झील में स्नान से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।

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ऐसी धार्मिक मान्यता है। कैलास मानसरोवर के कारण ही कुमाऊं अंचल को मानसखंड कहा जाता है।

1960 में यात्रा पर नहीं था कोई प्रतिबंध
1960 तक कैलास मानसरोवर यात्रा पर जाने के लिए किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था। भारत और चीन के संबंधों में कटुता आने के कारण 1960 में यह यात्रा बंद हो गई।

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कम से कम भारतीय हिंदुओं के लिए कैलास मानसरोवर के दर्शन दुर्लभ हो गए। भारत और चीन के बीच संबंध सामान्य होने पर 1981 में फिर से यात्रा के संचालन पर सहमति तो बनी लेकिन इसे कई प्रतिबंधों से बांध दिया गया।

यात्रा की अवधि जून से सितंबर तक तय की गई। यात्रियों का चयन विदेश मंत्रालय के स्तर से होने लगा। यात्रा संचालन की जिम्मेदारी कुमाऊं मंडल विकास निगम को दी गई।

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भारत तिब्बत सीमा पुलिस यात्रियों की मदद को लगाई गई। लिपुलेख दर्रा पार करने के बाद तिब्बत में प्रवेश करते ही यात्रियों की सारी व्यवस्था चीन सरकार संभालती है।

ये है प्रस्तावित यात्रा रूट

दिल्ली से काठगोदाम
काठगोदाम से अल्मोड़ा
अल्मोड़ा से चौकोड़ी
चौकोड़ी से मिर्थी
मिर्थी से धारचूला
धारचूला से गाला
गाला से बूंदी
बूंदी से गर्व्यांग
गर्व्यांग से गुंजी
गुंजी से कालापानी
कालापानी से नाभीढांग
नाभीढांग से तिब्बत में प्रवेश

यात्रा कार्यक्रम
आठ जून से नौ सितंबर तक चलेगी यात्रा
18 यात्रियों का होगा एक बैच
पांच मार्च त‌क ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं
10 मार्च है सामान्य आवेदन की अंतिम तिथि
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यात्रा मार्ग की स्थिति

कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग पर कालापानी से लेकर तिब्बत की सीमा तक इस समय भारी बर्फ जमा है। गाला से आगे गुंजी तक भी बर्फ तो है लेकिन रास्ते टूटे नहीं हैं।

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भारत तिब्बत सीमा पुलिस सातवीं वाहिनी के सेनानी केदार सिंह रावत ने बताया कि मार्च में उनकी टीम रास्ते का सर्वे करेगी और रिपोर्ट जिला प्रशासन तथा विदेश मंत्रालय को देगी।

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इसी रिपोर्ट के आधार पर रास्तों की मरम्मत का काम शुरू होगा। वह कहते हैं कि इस बार यात्रियों को धारचूला से गाला तक वाहनों से ले जाया जाएगा।

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इस बार भी यात्रा एक जून से प्रस्तावित है। वर्ष 2013 में भारी आपदा के कारण सिर्फ एक दल यात्रा पर जा पाया। शेष दलों की यात्रा स्थगित कर दी गई।
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