उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों से साथ सरकारी नौकरी में आरक्षण के नाम पर बहुत बड़ा धोखा हुआ हुआ है।
नौकरियों में आंदोलनकारियों को आरक्षण के नाम पर इन्हें नियुक्ति दी गई, लेकिन नैनीताल उच्च न्यायालय के एक फैसले के बाद हटा दिया गया। खास बात यह है कि नियुक्ति पाने वाले सभी कर्मचारी नहीं हटाए गए।
यहां सरकारी विभागों का रवैया मनमानीपूर्ण रहा। किसी ने आंदोलनकारियों को हटा दिया, किसी ने पद पर बने रहने दिया। आंदोलन के दौरान तन पर लाठियां खाने के बाद नौकरी से हटाए गए आंदोलनकारियों की पीर तो पर्वत से भी बड़ी साबित हो रही है।
खटीमा निवासी आंदोलनकारी दान सिंह बिष्ट जूनियर हाईस्कूल में सहायक अध्यापक थे। 16 साल नौकरी के बाद वर्ष 2013 में मार्केटिंग इंस्पेक्टर बने। 28 फरवरी 2014 से तीन मार्च 2014 तक सितारगंज में तैनाती के बाद उन्हें नौकरी से हटा दिया गया।
चमोली निवासी जगदीश चंद्र पंत ने जल संस्थान श्रीनगर में कनिष्ठ अभियंता पद पर सात माह काम किया। उनका चयन राज्य आंदोलनकारी आरक्षण के तहत इस पद पर किया गया था। 21 सितंबर 2014 को उन्हें बाहर कर दिया गया।
कोटद्वार निवासी क्रांति कुकरेती एक निजी संस्थान में कार्यरत थे। वर्ष 2013 में राज्य अवर अधीनस्थ सेवा परीक्षा में उनका चयन हुआ। पूर्ति निरीक्षक के पद पर वह चुने गए थे, लेकिन तैनाती से पहले ही उन्हें हटा दिया गया।