हर साल की तरह इस बार भी आषाढ़ माह शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को जग के नाथ भगवान जगन्नाथ नगर परिक्रमा पर निकले। शुक्रवार को चैतन्य महाप्रभु गौड़य नामहट्ट आध्यात्मिक सनातन शिक्षा केंद्र की ओर से आयोजित रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा अलग-अलग रथ में सवार होकर यात्रा पर निकले।
हाथीबड़कला स्थित नया गांव से निकली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा शहर के कई मार्गों से होते हुए जोहड़ी गांव में संपन्न हुई। इससे पहले विशेष पूजा अर्चना कर विश्व कल्याण के लिए प्रार्थना की गई। यात्रा के दौरान कई सुंदर भजनों और भगवान जगन्नाथ के जयकारों से माहौल भक्तिमय हो गया। यात्रा के संपन्न होने पर मंदिर में पूजा अर्चना करने के बाद भक्तों को महाप्रसाद वितरित किया गया। यात्रा के आगे सेवादार सड़क पर झाडू़ लगाते हुए चल रहे थे। उड़ीसा की तर्ज पर दून में निकली भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की खास बात यह है कि रथ में एक भी कील का प्रयोग नहीं किया गया।
भगवान जगन्नाथ समेत बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं नीम की लकड़ी से बनाई गई थी, जबकि रथों में रंगों का विशेष ध्यान रखा गया था। भगवान जगन्नाथ का रंग सांवला होने के कारण नीम की उसी लकड़ी का इस्तेमाल किया गया जो सांवले रंग की होती है, जबकि भाई-बहन का रंग गोरा होने के चलते उनकी मूर्तियों को हल्के रंग की नीम की लकड़ी से तैयार किया गया। रथ पूरी तरह से लकड़ी से बनाया गया था, जबकि रथ में कोई भी धातु का इस्तेमाल नहीं किया गया था। रथ की लकड़ी का चयन बसंत पंचमी के दिन और रथ बनाने का कार्य अक्षय तृतीया को किया जाता है।
विश्राम करने मौसी के घर जाते जगन्नाथ
आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को निकली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को श्रद्धालु ढोल, नगाड़ों, तुरही और शंख ध्वनि के बीच श्रद्धाभाव से खींच रहे थे। शहर के कई मार्गों से होकर गुंडीचा मंदिर पर भगवान जगन्नाथ की यात्रा संपन्न होती है। माना जाता है कि यह भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर है और वह यहां विश्राम करने आते हैं।