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योग दिवस : कोरोना काल ने योग पर बढ़ाया लोगों का विश्वास, करोड़ों रुपये के कारोबार को भी किया प्रभावित

Mon, 21 Jun 2021 03:26 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून

सार

उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद राज्य ने जिन क्षेत्रों में तरक्की की योग और वेलनेस सेक्टर उनमें से एक था। योग यहां के युवाओं के लिए एक बेहतर रोजगार के रूप में सामने आया।
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लोगों का विश्वास योग के प्रति अधिक बढ़ा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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एक शोध के जरिए यह साबित हुआ है कि कोरोना काल में लोगों का विश्वास योग के प्रति अधिक बढ़ा है। शोध में दिल्ली एनसीआर के 350 लोगों को चुना गया, जो 50 दिनों तक चली यौगिक क्रियाओं में अंत तक जुड़े रहे।

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शोध में शामिल किए गए प्रतिभागियों ने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि कोरोना काल के चलते न केवल योग के प्रति आकर्षण और विश्वास बढ़ा, बल्कि योग करने से उन्हें काफी हद तक तनाव और चिंता से मुक्ति मिली है। यही नहीं, कई तरह की बीमारियां स्वत: ही ठीक होने लगी हैं। 
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सामान्य तौर पर तो देखने में आया ही है कि कोरोना काल में योग के प्रति लोगों की रुचि और विश्वास मजबूत हुआ है, लेकिन यह बात उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय में योगा साइंस डिपार्टमेंट के एचओडी डॉ. कामाख्या कुमार और शारदा यूनिवर्सिटी ग्रेटर नोएडा में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुधांशु शर्मा की ओर से ‘कोरोना संकट में परंपरागत योग तंत्र में भारतीयों का विश्वास’ विषय पर संयुक्त रूप से किए गए शोध में साबित हुई है।

डॉ. कामाख्या कुमार ने बताया कि उन्होंने कोरोना की पहली लहर के दौरान वालंटियर की मदद से दिल्ली एनसीआर के करीब 400 लोगों में से 350 लोगों को शोध में शामिल किया। इनमें से 165 लोग विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े थे, जबकि 185 छात्र थे। इन सभी को 50 दिनों तक योग कराया गया। खास बात यह रही कि इन सभी ने आखिर तक ऑनलाइन योग क्लास ज्वाइन की।

शोध के दौरान प्रतिभागियों के अनुभवों को इसमें शामिल किया गया। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि कोरोना काल के चलते उनका योग के प्रति आकर्षण और विश्वास बढ़ा है। प्रतिभागियों ने बताया कि योग करने से कई तरह की बेफिजूल चिंताओं से तो मुक्ति मिली ही है, साथ ही उनका तनाव भी कम हो गया है।

इंडियन जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज में प्रकाशित हुआ शोध 
डॉ. कामाख्या कुमार ने बताया कि अक्तूबर, 2020 में शोध पूरा होने के बाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस कम्यूनिकेशन एंड रिसर्च की ओर से प्रकाशित इंडियन जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज में भी इसका प्रकाशन हुआ है। डॉ. कामाख्या कुमार ने बताया कि शोध के तहत दिल्ली के लोगों को इसलिए चुना गया, क्योंकि उस समय दिल्ली में तेजी से कोरोना फैल रहा था। साथ ही नौकरीपेशा लोगों की जिंदगी अपेक्षाकृत तनावपूर्ण थी। ऐसे में यह पाया गया कि दिल्ली के लोगों से ही शोध के बेहतर परिणाम हासिल होंगे। शोध के दौरान प्रतिभागियों द्वारा ली गई रुचि से यह साबित भी हुआ है।

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करोड़ों रुपये के योग कारोबार को कोरोना ने किया प्रभावित 

उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद राज्य ने जिन क्षेत्रों में तरक्की की योग और वेलनेस सेक्टर उनमें से एक था। योग यहां के युवाओं के लिए एक बेहतर रोजगार के रूप में सामने आया। बाबा रामदेव और दूसरे कई योगाचार्यों ने योग को प्रसिद्धि दिलाई तो उत्तराखंड योग हब के रूप में स्थापित होने लगा। लेकिन सरकारों के स्तर पर बात घोषणाओं से आगे नहीं बढ़ी। 

तीर्थनगरी ऋषिकेश में र्स्वागाश्रम पौड़ी जनपद में 250 से अधिक, टिहरी तपोवन क्षेत्र में 80 से अधिक और ऋषिकेश क्षेत्र में 100 से अधिक योग सेंटर कोरोना महामारी के चलते बीते डेढ़ साल से बंद पड़े हैं। ऐसे में योग से जुड़े इन गुरुओं के सम्मुख रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

यूजीटीई योगपीठ, ऋषिकेश के फाउंडर राजेंद्र प्रसाद गैरोला कहते हैं सालभर विदेशी योग साधकों से भरे रहने वाले इन केंद्रों पर अब सन्नाटा पसरा हुआ है। लॉकडाउन के कारण सभी योग संचालकों को आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ रहा है। राज्य सरकार को चाहिए कि योगाचार्य को आर्थिक मदद प्रदान करने वाली कोई योजना लांच करे।

धरातल पर नहीं उतरीं योग के सिलसिले में की गई घोषणाएं 
वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्य में बीस हजार योग प्रशिक्षितों को नियुक्त करने की कही बात कही थी। माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा को ऐच्छिक विषय के रूप में शामिल करने की भी घोषणा की थी। इसके बाद वर्ष  2017 में पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तराखंड को योग का बड़ा केंद्र बनाए जाने का वादा किया था।

स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों तक के पाठ्यक्रम में योग को शामिल करने और योग के क्षेत्र में रोजगार देने की घोषणा की थी। लेकिन ये घोषणाएं कभी धरातल पर नहीं उतरीं। युवाओं ने विभिन्न महाविद्यालयों से योग में डिग्रियां तो हासिल कीं, लेकिन अब उनके पास तीन ही विकल्प मौजूद हैं।

वे किसी योग सेंटर में शिक्षक बन जाएं, कर्ज लेकर अपना योगालय खोल दें, या फिर किसी विदेशी धरती पर योगाचार्य बनकर योग सिखाने निकल जाएं। सरकार के पास योगाचार्यों को देने के लिए फिलहाल कुछ नहीं है। योगाचार्यों को इस योग दिवस पर भी सरकार की नई घोषणा का इंतजार है। 

दो वर्ष से कॉलेज बंद होने के कारण भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। कॉलेज की बिल्डिंग का किराया भी देना मुश्किल हो गया है। ऑनलाइन पढ़ाई के माध्यम से बच्चों में योग को लेकर रुझान कम है। 
- योगाचार्य भारती, आदिगुरु योग विज्ञान एवं भारतीय स्वास्थ्य ध्यान अकादमी ऋषिकेश की प्रिंसिपल

दो वर्ष से विद्यालय बंद होने के कारण अपने गांव घनसाली में रहकर खेती एवं पिता के साथ पंडिताई का कार्य कर रहा हूं। योग हमारे लिए सिर्फ रोजगार नहीं, हमारी आत्मा से जुड़ा विषय है। हम योग के गुर दूसरों को सीखकर जीवन को जीने का मंत्र देते हैं। 
- अंकित नैथानी, योग शिक्षक, श्री कृष्ण देशिक संस्कृत विद्यालय, मायाकुंड, ऋषिकेश
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