उत्तराखंड के पुलिस महकमे में प्रमोशन को लेकर एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति पैदा हो गई है। आईजी के रिक्त एक पद के लिए तीन दावेदार हैं।
आईजी बनने की जुगत
हालांकि इस पद पर प्रमोशन वरिष्ठता व सर्विस रिकॉर्ड के आधार पर मिलता है, लेकिन सभी दावेदारों ने पूरा जोर लगा रखा है। पद नहीं होने की स्थिति में एक्स कैडर पोस्ट सृजित करवाकर आईजी बनने की जुगत भी भिड़ाई जा रही है।
राज्य पुलिस में जल्द ही आईजी व डीआईजी के पदों पर पदोन्नति होगी। दोनों ही पदों पर अलग-अलग तरह से लॉबिंग हो रही है। आईजी का केवल एक पद रिक्त है। एक पद मई में रिक्त होगा, लेकिन कानूनीतौर पर उसकी रिक्ति एक जनवरी 2016 में मानी जाएगी।
शेष एक पद के लिए तीन दावेदार हैं और तीनों ही एक बैच के होने से बेचैनी बढ़ना लाजिमी है। इनमें सबसे वरिष्ठ हैं अमित सिन्हा, जिनका आईजी बनना तय माना जा रहा है। सीबीआई में प्रतिनियुक्ति पर तैनात मुरुगेशन दूसरे नंबर पर हैं। वह जल्द ही राज्य कैडर में ज्वाइनिंग देने वाले हैं।
सबसे जूनियर डीआईजी गढ़वाल संजय गुंज्याल हैं। अब इस बात के लिए जोर आजमाइश हो रही है कि आईजी की दो एक्स कैडर पोस्ट कैसे सृजित हों। हालांकि गृह विभाग ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी फाइल में एक ही पद की डीपीसी की मंजूरी मांगी है। लेकिन अभी भी प्रमोशन पाने के नए रास्ते खोजे जा रहे हैं।
आईजी मानवाधिकार आयोग कैडर पद नहीं है। इसलिए यदि पुलिस विभाग में एक्स कैडर पोस्ट की मंजूरी नहीं मिली तो इसी पद पर तैनाती कराने का भी प्रयास होगा।
लेकिन जैसी कि चर्चा है, यदि मुरुगेशन अगले महीने प्रतिनियुक्ति से वापस आए तो फिर एक पद और ढूंढना होगा। क्योंकि यदि सरकार ने गुंज्याल को आईजी का पद दिया तो मुरुगेशन को सीनियर होने के नाते पहले देना पड़ेगा।
DIG स्तर पर दो पदों पर पदोन्नति भी
दूसरी तरफ, डीआईजी स्तर पर दो पदों पर पदोन्नति होनी है। इनमें एक एसएसपी देहरादून अजय रौतेला और दूसरे अपर सचिव गृह पुष्पक ज्योति हैं।
कुछ नेता इस बात की लॉबिंग कर रहे हैं कि डीआईजी की डीपीसी लटक जाए और रौतेला को ज्यादा समय तक कप्तान रखा जाए। क्योंकि डीआईजी बनने के बाद उन्हें जिले से हटाना पड़ेगा।
अभी तो डीआईजी का एक पद खाली है, लेकिन अमित सिन्हा के आईजी बनते ही एक और पद रिक्त होने से इनकी संख्या दो हो जाएगी। और, यहां आईजी पद पर प्रमोशन जैसी जुगाड़बाजी की जरूरत नहीं होगी।
क्योंकि डीआईजी के दो पद रिक्त होंगे और दो ही दावेदार भी। अब निगाहें इसी बात पर है कि सरकार करती क्या है, चहेतों को राहत देने के लिए यू-टर्न लेती है या सब काम कानून के हिसाब से होगा।