सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत चार बिंदुओं पर सूचना देने के बजाय आरटीओ दफ्तर ने 10 हजार पेजों का पुलिंदा थमा दिया।
इसके लिए सूचना मांगने वाले को करीब 20 हजार रुपये खर्च करने पड़े। यही नहीं कागजों के गट्ठर को लेने के लिए ऑटो भी बुक करना पड़ा। कोर्ट रोड स्थित कार्यालय में सिटी बस मालिक विजयवर्धन डंडरियाल ने पत्रकारों को इस मामले की जानकारी दी।
मांगी थी ये जानकारी
विजयवर्धन ने आरटीओ कार्यालय से 1 जनवरी 09 से 10 नवंबर 2013 तक ठेका परमिट विक्रमों में मीटर न लगाने, चालकों द्वारा वर्दी न पहनने, फ्रंट शीशे के ऊपर रूट नंबर लिखने, विक्रम व सिटी बसों के फुटकर सवारियां बैठाने पर किए गए चालान की सूचना मांगी थी।
आटीओ कार्यालय ने यह सूचना 10 हजार 112 पेज में होने की बात कही। जिसके लिए विजयवर्धन को 20 हजार 224 रुपये चुकाने पड़े।
40 पेज में मिल गईं सूचना
विजयवर्धन डंडरियाल ने कागजों का पुलिंदा घर लाकर खुद सूचनाएं ढूंढीं तो महज 40 पेजों में मांगी गई जानकारी मिल गई। पांच साल में फुटकर सवारी उठाने में सिर्फ एक विक्रम का चालान किया। जबकि सिटी बस संचालकों के वर्दी न पहनने पर कई चालान किए गए हैं।
हालांकि, विक्रम वालों के वर्दी न पहनने और रूट स्थान न लिखने के बारे में कोई सूचना नहीं दी गई। डंडरियाल का कहना है कि सूचना का अधिकार अधिनियम की मूल भावना से खिलवाड़ करने और मानसिक शोषण करने के खिलाफ उन्होंने प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष अपील की है।