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वेयर डू आई बिलांग: यूरोप में भारत की कहानी

Wed, 30 Jul 2014 05:06 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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दून की लेखिका अर्चना पैन्यूली विदेश में रहकर भी भारत की सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए हैं। वे उत्तराखंड की ऐसी पहली लेखिका हैं जिनके हिंदी उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद किया गया है।
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राजधानी देहरादून में रीच विरासत संस्था की ओर से अर्चना पैन्यूली के उपन्यास 'वेयर आई डू बिलांग पर चर्चा' कार्यक्रम आयोजित किया गया।

चर्चा कार्यक्रम में बोलते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र का कहना है कि शैक्षिक केंद्र होने के बावजूद दून में साहित्यिक गतिविधियां शून्य ही नहीं, बल्कि ऋणात्मक हैं।

डॉ. मिश्र ने कहा कि विदेश में रह कर अर्चना हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभा रही हैं।

इस मौके पर पुस्तक के बारे में चर्चा करते हुए गोविंद प्रसाद बहुगुणा ने कहा कि 'वेयर डू आई बिलांग' विषय और भाषा दोनों के लिहाज से साहित्य का उत्कृष्ट नमूना है।
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यह विशिष्ट विषय पर लिखित अंतरराष्ट्रीय थीम का उपन्यास है। कहा कि अर्चना पैन्यूली उत्तराखंड की पहली ऐसी लेखिका हैं, जिनके हिंदी उपन्यास का रूपांतरण अंग्रेजी में किया गया है।

जीजीआईसी की प्रिंसिपल सरोजनी नौटियाल ने कहा कि हालांकि उपन्यास में डेनमार्क निवासी भारतीय अप्रवासियों के जीवन को चित्रित गया है परंतु कथावस्तु और सामग्री में यह लोकल और ग्लोबल दोनों है। आज के वैश्विक परिवेश में सटीक बैठता उपन्यास की एक सार्वभौमिक अपील है।

विदेशों में बसे इंडियन पर होगा अगला उपन्यास

डीआईटी के छात्र असीम जोशी ने कहा कि उपन्यास के जरिये भिन्न संस्कृति और परिवेश की जानकारी मिलती है। हर समाज में पति-पत्नी के बीच प्यार-मोहब्बत, गिले-शिकवे होते हैं मगर तलाक के बारे में भारतीय संस्कृति में जितनी अधिक भ्रांतियां और वर्जनाएं हैं उतनी पाश्चात्य संस्कृति में नहीं हैं।

सांसों में बसता है देहरादून
लेखिका अर्चना पैन्यूली ने कहा कि देहरादून मेरी सांसों में बसता है। यहां की साहित्य अकादमियों, स्थानीय संस्थाओं और साहित्यकारों से जुड़े रहना मेरे लिए बहुत मायने रखता है।

मैं जबसे डेनमार्क गई विदेश में बसे इंडियन डायस्पोरा व इंडियन कम्यूनिटी पर लिख रही हूं। लेकिन मेरी हार्दिक इच्छा रहती है कि मैं अपने लेखन द्वारा अपने मूल शहर और राज्य के बारे में लिखूं।

वरिष्ठ साहित्यकार डा.अचलानंद जखमोला ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। रीच विरासत के सेक्रेटरी सुनील वर्मा की कार्यक्रम के आयोजन में विशेष भूमिका रही।
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'वेयर डू आई बिलांग' पुस्तक की एक झलक

भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित वेयर डू आई बिलांग डेनिश समाज पर हिंदी में लिखा गया पहला ऐसा उपन्यास है, जिसमें विदेश में बसे अप्रवासियों के संघर्षों, कामयाबियों और दुविधाओं को मार्मिक ढंग से रेखांकित किया गया है।

उपन्यास एक भारतीय आप्रवासी की तीसरी पीढ़ी की युवती रीना और उसके परिवार पर केंद्रित है, जो अपने अपनाए मुल्क में जीवन की वास्तविकताओं से स्वयं को समायोजित करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है।

उपन्यास की कामयाबी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2010 में प्रकाशित होने के बाद इसका दूसरा संस्करण वर्ष 2013 में प्रकाशित किया गया। मार्च 2014 में रूपा प्रकाशन ने इसे अंग्रेजी में प्रकाशित किया है।

लेखिका के बारे में
मूल रूप से देहरादून की रहने वाली अर्चना पैन्यूली पिछले 17 वर्षों से डेनमार्क में रह रही हैं। अर्चना वर्तमान जातीय व प्रवासन मुद्दे एवं इंडियन डायस्पोरा पर कहानियां और लेख लिखती रहती हैं।

डेनमार्क की सुप्रसिद्ध लेखिका कारेन बिलिक्शन की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया है। वेयर डू आई बिलांग उनका दूसरा उपन्यास है जो गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय नोएडा के एमए चौथे सेमेस्टर में इंडियन डायस्पोरा के अंतर्गत कोर्स में लगा है।

नोटः विदेशों में रह रहे प्रवासी उत्तराखंडी अगर अपना कोई संस्मरण साझा करना चाहते हैं तो हमें इस पते (amarujalalive@gmail.com, या ddesk@ddn.amarujala.com) पर भेजें। ज‌िसे हम अपने वेबसाइट और अखबार के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचायेंगे।
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