पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष बहादुर सिंह पाटनी ने नेपाल के नए नक्शे को इतिहास के साथ छेड़छाड़ बताया है। पाटनी ने बताया कि कालापानी क्षेत्र को लेकर वर्ष 1816 में तत्कालीन नेपाल नरेश और हिंदुस्तान के ब्रिटिश हुकमरानों के बीच सिगौली संधि हुई थी। अंग्रेज हुकमरानों ने 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान (पूर्वी पाकिस्तान अब बांग्लादेश, एवं पश्चिमी पाकिस्तान) को स्वतंत्र किया, जिसके दूसरे दिन 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्र किया गया। अंग्रेजों ने जितना भूभाग भारत को सौंपा उसमें भारत ने किसी की भी एक इंच भूमि नहीं कब्जाई है। नेपाल किसी अन्य देश के उकसाने पर गलत कर रहा है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कालापानी समझौता अंग्रेज हुकमरानों एवं तत्कालीन नेपाल नरेश के बीच हुआ था न कि भारत सरकार के साथ।
इन्होंने भी रखी अपनी राय
कालापानी सीमा विवाद नेपाल की आम जनता फैसला नहीं हो सकता है। क्योंकि दोनों देशों के आम लोग रोटी-बेटी के रिश्ते की अहमियत समझते हैं और मानते हैं। भारत के आत्म निर्भर भारत बनाने के संकल्प से तीसरा देश बौखला गया है और वह नहीं चाहता है कि भारत और नेपाल में मैत्री कायम रहे। यही वजह है कि चीन के उकसावे पर नेपाल की ओली सरकार भारत के साथ सदियों पुराने मधुर रिश्तों को खराब करने के काम में जुटी है।
दीप चंद्र पाठक, भाजपा जिलाध्यक्ष, चंपावत।
भारत के कालापानी क्षेत्र का अपना दिखाकर नेपाल का नया नक्शा जारी करने का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है। नेपाल ने ऐसे समय में विवाद को हवा दी है, जब पूरा विश्व कोरोना महामारी से लड़ रहा है। नेपाल सरकार ने राजनीति के लिए इस मुद्दे को हवा दी है। भारत का नेपाल के बीच हजारों किलोमीटर की खुली सीमा से पता चलता है कि नेपाल से रोटी-बेटी के रिश्ते सदियों पुराने हैं। लेकिन नेपाल की वर्तमान सरकार यह रिश्ते खत्म करने पर तुली हुई है, जिसे दोनों देश की जनता होने नहीं देगी।
हर्षवर्धन सिंह रावत, पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष, टनकपुर।
मेरा मानना है कि कालापानी के मुद्दे पर नेपाल की 90 प्रतिशत जनता सहमत नहीं होगी। इस विवाद पर नेपाल की ओर से उठाए जा रहे कदमों से भारत और नेपाल के रिश्ते बिगड़ सकते हैं। नेपाल हमारा बहुत अच्छा मित्र राष्ट्र है, लेकिन मौजूदा समय में उसके हर कदम को भारत सरकार ने गंभीरता से लेना चाहिए। नेपाल की हर हरकत पर नजर रखते हुए उनके अनुरूप कदम उठाने चाहिए।
रिटायर्ड कै. भानी चंद, अध्यक्ष गोरव सेनानी कल्याण समिति, टनकपुर-बनबसा।