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उत्तराखंड: चीन सीमा पर बढ़ी ड्रेगन की गतिविधियां, सीमांत इलाकों में शस्त्र प्रशिक्षण की दरकार

Sun, 25 Jul 2021 05:06 PM IST
अलका त्यागी कालिका रावल, अमर उजाला, बागेश्वर

सार

वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद उपजी परिस्थितियों को देखते हुए वर्ष 1963 में केंद्रीय कैबिनेट के अधीन सीक्रेट सर्विस ब्यूरो (एसएसबी) का गठन किया गया था।
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चीन सीमा पर भारतीय जवान - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार
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सीमा पर ड्रेगन की गतिविधियां बढ़ती जा रहीं हैं। ऐसे में एसएसबी को पुराने स्वरूप में लाने की जरूरत है। इसका लाभ चीन समेत अन्य देशों की सीमा से सटे सीमांत क्षेत्र को मिल सकता है बल्कि यह देश के लिए भी मुफीद होगा।

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वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद उपजी परिस्थितियों को देखते हुए वर्ष 1963 में केंद्रीय कैबिनेट के अधीन सीक्रेट सर्विस ब्यूरो (एसएसबी) का गठन किया गया था। वर्ष 2001 में एनडीए सरकार ने एसएसबी को सशस्त्र सीमा बल के रूप में पैरामिलिट्री फोर्स का दर्जा देकर इस बल को गृह मंत्रालय के अधीन कर दिया। इससे गुरिल्लों की भूमिका समाप्त हो गई। तब से सीमांत के गांवों में हथियार का प्रशिक्षण देना भी बंद हो गया।  

एसएसबी का गठन पूरी तरह से खुफिया जानकारी देने और सीमांत के गांवों में लोगों को हथियारों के प्रशिक्षण के लिए किया गया था। दशकों तक इस बल ने बखूबी अपनी जिम्मेदारी निभाई। गुरिल्ला बल के विशेष स्वयंसेवक होते थे, जिन्हें हिमाचल के सराहन और ग्वालदम चमोली में 45 दिन तक छद्मयुद्ध का कठोर प्रशिक्षण दिया जाता था। गुरिल्ला प्रशिक्षण के बाद भी समय-समय पर इन लोगों को प्रशिक्षण दिया जाता था।
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प्रशिक्षण अवधि का मानदेय भी मिलता था। छद्मयुद्ध का प्रशिक्षण प्राप्त स्वयंसेवक गुरिल्ला कहलाते हैं। एसएसबी की भूमिका बदलने से पहले एसएसबी में गुरिल्लों  की ही भर्ती होती थी। एसएसबी का स्वरूप बदलने के बाद पूर्वोत्तर के गुरिल्लों को वर्ष 2004 में एसएसबी में समायोजित किया गया लेकिन उत्तराखंड समेत कई सीमावर्ती राज्यों के गुरिल्लों को एसएसबी में समायोजित नहीं किया गया। गुरिल्ला स्वयंसेवकों की राय है कि गुरिल्लों की भूमिका अहम हो सकती है। केंद्र सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। 

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गृह मंत्रालय ने वर्ष 2015 में कराया था गुरिल्लों का सत्यापन

उत्तराखंड में एसएसबी प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की संख्या 20 हजार के करीब है। एसएसबी के गुरिल्ला वर्ष 2004 से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। अल्मोड़ा में वर्ष 2004 से लगातार आंदोलन चल रहा है। कम उम्र के गुरिल्लों को एसएसबी में समायोजित करने, अधिक उम्र के स्वयंसेवकों और मृतक गुरिल्लों के परिजनों के लिए पेंशन मांगी जा रही है।

वर्ष 2015 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गुरिल्लों का सत्यापन कराया था। उम्मीद थी कि गुरिल्लों को समायोजित कर कोई फैसला लिया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। एसएसबी स्वयंसेवक संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष ब्रह्मानंद डालाकोटी का कहना है कि केंद्र सरकार गुरिल्लों का महत्व नहीं समझ रही है। यह कष्टदायी है। कहते हैं कि सीमांत क्षेत्र में फिर से युवाओं को गुरिल्ला प्रशिक्षण देना चाहिए। 

एसएसबी के स्वयंसेवकों को नौकरी देने के लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकार से कहा है। सीमांत क्षेत्र में फिर से युवाओं को शस्त्र प्रशिक्षण देने का मामला गृह मंत्रालय के सामने उठाया जाएगा। गुरिल्लों की मांग को पूरा कराने का प्रयास किया जाएगा। 
- अजय टम्टा, सांसद, अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र।
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