देहरादून जिले के कई गांवों के लोगों ने इस पानी की टंकी के पास एकत्र होकर आंदोलन की रणनीति बनाई। 1945 के दौरान क्षेत्र के युवा पद्म सिंह सोलंकी, वैद्य सेनपाल सिंह भिडोला, गौरीश वर्मा, बुद्धदेव, शेरा के पंचम सिंह कृषाली, बमेत के पद्म सिंह रावत, बड़ासी के हरि सिंह गोदी, भूरिया सिंह व विशन सिंह और घंडोल के सूरत सिंह चौहान के साथ सैकड़ों आंदोलनकारी यहीं अनशन पर बैठ गए।
जिसके बाद अंग्रेजों ने इन लोगों पर लाठीचार्ज किया और जेल में बंद कर दिया। देशभर के अनगिनत आजादी के दीवानों की तरह थानो के स्वतंत्रता सेनानी भी गुमनामी के अंधेरे में डूब गए।
स्थानीय लोगों की मांग है कि इस पानी की टंकी को स्मारक के रूप में विकसित किया जाए। ताकि, आने वाली पीढ़ियां अपने पूर्वजों के इस बलिदान और संघर्ष को याद रख सकें।