उसी दौर में ऋषिकुल के स्नातक जगदीश वत्स ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ऐतिहासिक सुभाष घाट पर तिरंगा फहराने की ठानी। उन्होंने एक नहीं तीन तिरंगे अपने साथ लिए। कुछ साथियों के साथ वंदेमातरम गाते जगदीश वत्स सुभाष घाट पहुंचे और देखते ही देेखते तिरंगा फहरा दिया।
जगदीश वत्स की जानकारी जैसे ही अंग्रेज पुलिस को मिली वह सुभाष घाट की तरफ दौड़ी। जगदीश वत्स पर तो मानो दीवानगी सवार थी। वे अपने चंद साथियों के साथ भारतमाता के तराने गाते हुए कोतवाली पहुंचे और बगल में स्थित डाकघर पर तिरंगा फहरा दिया। आजादी का यह दीवाना लोगों से साथ आने का आह्वान करता हुआ रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ा। उसने स्टेशन की छत पर चढ़कर जैसे ही तिरंगा फहराया, तब तक वहां पहुंच चुकी अंग्रेज पुलिस के कोतवाल ने उन्हें छत पर ही गोलियों से भून दिया। आजादी का यह दीवाना राष्ट्र की वेदी पर शहीद हो गया। जगदीश वत्स की स्मृति में हरिद्वार में शहीद पार्क की स्थापना की गई है।
आजादी के आंदोलन की मशाल अनेक क्रांतिकारियों ने उठाई। इनमें पंडित हरि प्रसाद पटुवर, श्यामलाल वैद्य, कृष्ण दत्त मिश्र, ओम प्रकाश गांधी, वैद्य सोमदत्त, रामजी दास पटुवर, वासुदेव ठेकेदार, कृष्णलाल धींगड़ा, नंदलाल धींगड़ा, कौशल्या देवी, सरदार बलवंत सिंह, केशवराम बेरी, त्रिलोकनाथ सरीन, चौधरी राम भज, वैद्य विष्णु दत्त, हीरा वल्लभ त्रिपाठी, हरिदत्त बहुगुणा, आचार्य किशोरी दास वाजपेयी, बेणी प्रसाद जिज्ञासु, लीलावती, शकुंतला देवी, आरडी कौशिक आदि प्रमुख हैं।