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उत्तराखंड सरकार नहीं चाहती थी पंचायत चुनाव

Fri, 28 Feb 2014 11:41 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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यह बात बिना मांगे मुराद पूरी होने जैसी ही रही। सरकार लगातार इस प्रयास में रही कि पंचायत चुनाव लोकसभा के बाद हो।
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उच्च न्यायालय ने सरकार को समय तो दिया मगर चुनाव मुल्तवी नहीं किए। लेकिन पल्ला सल्ट भ्रात मंडल के प्रतिनिधि दर्शन सिंह रावत की रिट के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया उससे सरकार के इच्छा पूरी हो गई।
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जल्द लागू होनी थी आचार संहिता

संभव था कि दो मार्च को राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के संबंध में आचार संहिता लागू होती। ल‌ेकिन उसके पहले ही शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पंचायत चुनाव पर अंतरिम रोक लग गई। चार सप्ताह में सरकार से जवाब मांगा गया है। यह फैसला सरकार के लिए काफी राहत भरा है।

घबरा रही थी सरकार
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि पंचायत चुनाव से सरकार इसलिए घबरा रही थी कि कहीं चुनाव परिणाम अनुकूल न रहे तो इसका असर लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा।

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ऐसे में पंचायत की हार हरीश रावत के खाते में दर्ज होगी। विपक्ष का भी यही मानना था। हालांकि, सरकार का तर्क अलग था।

हरीश रावत नहीं चाहते थे अभी चुनाव

मुख्यमंत्री खुद कहते थे कि आपदा का काम होना है, लोकसभा चुनाव भी हैं इसलिए पंचायत चुनाव कुछ बाद में हो जाए तो बेहतर होगा। उनका कहना था क‌ि लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने तक कुछ और काम निबटा लिए जाएंगे।

सूचना मिलने के बाद लिए कैबिनेट के फैसले
जब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया उस वक्त राज्य कैबिनेट की बैठक चल रही थी। जैसे ही पंचायत चुनाव से संबंधित सूचना मिली तो कुछ नए फैसले भी एजेंडे में जोड़ दिए गए।

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मसलन, कुछ ग्राम पंचायतों को नगर पंचायत में अपग्रेड करने का निर्णय। इस खबर के बाद ही पिथौरागढ़ की मुनस्यारी, अल्मोड़ा की चौखुटिया को नगर पंचायत, उत्तरकाशी की नगर पंचायत नौगांव व पिथौरागढ़ की धारचूला को नगर पालिका में अपग्रेड किया गया।

पंचायत प्रतिनिधियों में है नाराजगी

सरकार के उच्च न्यायालय जाने से पहले राज्य खुफिया विभाग ने एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। जिसमें इस बात का जिक्र था कि पंचायत चुनाव टालने की सरकार की मंशा से पंचायतों के 40 हजार से ज्यादा प्रतिनिधि नाखुश हैं, इसके बावजूद समय बढ़ा दिया गया।

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अब भले सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का बहाना सरकार को मिल गया हो, लेकिन विशेषज्ञ यही मानते हैं कि पंचायत प्रतिनिधियों में नाराजगी बरकरार है।
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'हरीश कैंप का है याचिकाकर्ता'

प्रजातांत्रिक प्रणाली में निर्वाचन का काम समय से कराना सरकार की जिम्मेदारी होती है, लेकिन राज्य की कांग्रेस सरकार पंचायत चुनाव कराने से भाग रही थी और भाजपा पूरी तरह से तैयार थी। सर्वोच्च न्यायालय ने जिस रिट पर चुनाव टालने का फैसला दिया है, उस याचिकाकर्ता को हरीश रावत कैंप ने ही न्यायालय भेजा था। क्योंकि सरकार के लिए रास्ते बंद थे। रिट दायर करने वाला हरीश के एक नजदीकी नेता का खासमखास है। यह फैसला प्रजातंत्र के लिए ठीक नहीं है।
-तीरथ सिंह रावत, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष
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