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हिमालय की ऊंचाई से जमीन के नीचे हो रही उथल-पुथल

Wed, 07 Oct 2015 01:13 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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हिमालय की ऊंचाई जैसे-जैसे बढ़ रही है भूगर्भ में दबाव के कारण उथल-पुथल तेज होती जा रही है। भारी चट्टानें भूगर्भ में धंस रही हैं और हल्की चट्टानें तेजी से ऊपर की तरफ आ रही हैं, इसी वजह से हिमालय क्षेत्र की सतह पर बदलाव आ रहा है।
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वाडिया हिमालय भूगर्भ संस्थान में मंगलवार से शुरू हुई तीन दिवसीय हिमालय-कराकोरम-तिब्बत कार्यशाला में जुटे दुनिया भर के भूगर्भ विज्ञानियों ने यह बात कही। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राज्यपाल डॉ. केके पॉल थे। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में राज्यपाल डॉ. पाल ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में भूकंप के बाद भी भूस्खलन होते हैं, विज्ञानी अध्ययन करें कि लैंड स्लाइड भूकंप के प्रभाव से हो रहे अथवा बरसात व अन्य कारण से।

यदि खोज की जाए तो हिमालयी क्षेत्र में बड़ी मात्रा में खनिज संपदा मिल सकती है। अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ में मैग्नासाइड, तांबा, जस्ता, चांदी जैसे खनिज पदार्थों की व्यापक संभावनाएं हैं। पहाड़ों पर बडे़ बांध बनने से भौगोलिक बदलावों का भी अध्ययन किया जाए। ग्लेशियरों और इको सिस्टम की स्थिति का अध्ययन जरूरी है।
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बाद में राज्यपाल ने वाडिया संस्थान परिसर में रुद्राक्ष का पौधा रोपा। इसके बाद दो तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया। इसमें बताया गया कि हिमालयी क्षेत्र में मिट्टी का कटाव बड़े पैमाने पर हुआ है। इससे नदियों में मिट्टी बढ़ी है और डेल्टा बन गए।

इसके साथ ही हिमालयी भूगर्भ में रसायनिक प्रतिक्रियाओं, चट्टानों में गैस की स्थिति आदि बिंदुओं पर देश-विदेश के 23 विज्ञानियों ने अपने-अपने शोध की स्लाइड के माध्यम से प्रस्तुति दी। प्रस्तुति देने वाले विज्ञानियों में पीजे ओबरियन, जोनेथन सी. एचीसन, एच. सकाई, डा. राजेश शर्मा आदि रहे। उद्घाटन सत्र में वाडिया के निदेशक डॉ.एके गुप्ता, डॉ.जीपी श्रीवास्तव, डॉ.बीना तिवारी, डॉ.पीएस नेगी आदि मौजूद रहे।
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भूगर्भ से निकलीं चट्टानों में मिथेन मिली

भूगर्भ से जमीन की सतह पर निकलने वाली चट्टानों में मिथेन मिली है। इस गैस की एक यूनिट कार्बनडाई आक्साइड से 25 गुना अधिक ग्लोबल वार्मिंग करती है। इस गैस का ऑटोमोबाइल्स उद्योग में भी इस्तेमाल होता है। विज्ञानी डॉ.राजेश शर्मा ने कार्यशाला में मिथेन पर अपना शोध प्रस्तुत किया।

उन्होंने बताया कि मणिपुर में क्रोमाइट, अल्मोड़ा में ग्रेफाइट तथा जीवाश्मों में भी मिथेन गैस मिली है। चट्टानों में मिले ‘माइक्रो बबल्स’ की जांच में मिथेेन मिली है। बताया कि भूगर्भ में 100 किमी नीचे मिथेन पाई गई है। भूगर्भ में जहां 700 सेंटीग्रेड से अधिक तापमान होता है मिथेन मिलती है। इसके ‘आइसोटोप्स’ की जांच कराई जाएगी।

चट्टानों की हरकतों से भूकंप का अंदेशा
जर्मनी से आए वरिष्ठ भूगर्भ विज्ञानी पीजे ओबरियन ने बताया कि हिमालयी क्षेत्र में भूगर्भ में 10 किमी नीचे भारी और हल्की चट्टानों में लगातार हरकत बनी हुई है। कार्यशाला में प्रस्तुत शोध में ओबरियन ने कहा कि चट्टानों के लगातार आगे-पीछे होने से भूकंप का खतरा बढ़ जाता है।

इसी वजह से हिमालयी क्षेत्र में बराबर झटके लगा करते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि भूगर्भ में भारी चट्टानें लगातार नीचे जा रही हैं और हल्की चट्टानें ऊपर की तरफ आ रही हैं। ओबरियन सोमरारी, हिंदुकुश आदि क्षेत्रों में 20 साल से पुरानी और नई चट्टानों पर शोध कर रहे हैं।

गर्म झरनों के पास हो सकता जियो टूरिज्म
वरिष्ठ विज्ञानी डॉ.संतोष राय का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में गर्म झरनों के पानी से नहाने से चर्मरोग ठीक हो जाते हैं। इनके पानी में सल्फर, जर्मेनियम, बोरान औ लीलियम तत्व पाए जाते हैं। इसके साथ ही पानी की ऊष्मा का इस्तेमाल कर सब्जियां भी उगाई जा सकती हैं। स्पा खोले जा सकते हैं।

उत्तराखंड में करीब 30 गर्म झरने हैं। ये समुद्र तल से दो हजार मीटर की ऊंचाई पर होते हैं। इन स्थलों पर जियो टूरिज्म विकसित किया जा सकता है। विदेशों में गर्म झरनों की ऊष्मा से बिजली भी बनाई जा रही है। गर्म झरनों के पानी का तापमान 28 से लेकर 94 डिग्री सेंटीग्रेड तक रहता है।

प्रदर्शनी लगाई, रंगारंग कार्यक्रम हुआ
हिमालय-कराकोरम-तिब्बत कार्यशाला के दौरान वाडिया हिमालय भूगर्भ संस्थान में प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इसमें चित्रों के माध्यम से अलग-अलग हिमालयी क्षेत्रों को प्रदर्शित किया गया। भूगर्भ से संबंधित अलग-अलग विषय दर्शाए गए थे। बाद में रंगारंग कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया।
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