हर्बल रंगों से होली खेलने की बातें तो हो रही हैं, लेकिन हर्बल पौधे आज विलुप्त होने की कगार पर आ चुके हैं।
हर्बल रंग कितने शुद्ध हैं, कहना मुश्किल
बाजार में मिलने वाले हर्बल रंग कितने शुद्ध हैं, कहना मुश्किल है। ऐसे में मिशन ट्रू बायोलॉजिस्ट हर्बल पौधों को बचाने की अनूठी मुहिम चला रहा है।
मिशन के संस्थापक एमएस मेहता ‘इकोमैन’ ने कहा कि हर साल हर्बल होली का संकल्प लिया तो जाता है, लेकिन किसी को पता नहीं कि किन पौधों से यह रंग बनते हैं। जिनसे यह बनते हैं, वह पौधे तो आसपास दिखाई भी नहीं देते।
इकोमैन ने कहा कि हम पहले इन पौधों को बचाएंगे, तभी हर्बल होली खेल पाएंगे। उनका तर्क है कि बाजार में मिलने वाले रंग, शुद्ध हर्बल नहीं हैं।
उन्होंने इस होली लोगों से हर्बल रंगों वाले पौधों को संरक्षित करने की अपील की। मिशन भी इसके लिए जागरूकता अभियान चला रहा है। इकोमैन ने कहा कि वह बीते 10 वर्षों से इस मुहिम में लगे हैं।
इन पौधों को करें संरक्षित
टेसू, हर श्रृंगार, सफेद चंदन, लाल चंदन, सेमल, अर्जुन और अशोक।
परंपराओं में है हर्बल होली
प्राचीन काल में न आर्टिफिशियल रंग थे, न मिलावटी हर्बल रंग। सिर्फ पौधों और फूलों से ही रंग तैयार किए जाते थे।
भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा, वृदावन में होली टेसू के फूल से खेली जाती थी। प्राकृतिक रंगों के साथ होली खेलने से पर्यावरण भी बचेगा और मनुष्य भी।