पर्वतीय राज्यों के विकास को लेकर एक ठोस नीति नहीं बनने से उत्तराखंड के पहाड़ों में सेहत और शिक्षा की हालत दयनीय है।
सही तरीके से नहीं हो रहा योजनाओं का संचालन
राजनीतिक दल फिलहाल आपदा को मुद्दा बनाए हुए हैं, लेकिन 14 बरस में पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा की दयनीय स्थिति इस बात का सबूत है कि न केंद्र की योजनाओं का संचालन सही तरीके से नहीं हो रहा है।
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राज्य में केंद्र की स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में कई योजनाएं संचालित हो रही हैं बावजूद इसके पहाड़ों में न तो डाक्टर हैं न ही मास्टर हैं।
केंद्र सरकार राज्यों में स्वास्थ्य सुधार के लिए एनआरएचएम जैसे महत्वपूर्ण योजना चला रही है, लेकिन उसके दिशानिर्देशों की लगातार अनदेखी हो रही है।
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मानव संसाधन की तर्कसंगत तैनाती का मसला केंद्र राज्य से उठता रहा है बावजूद इसके पहाड़ों में इलाज की सुविधाएं नाम भर की हैं।
चिकित्सकों की तैनाती के लिए जो माडल मिशन के तहत तैयार किया गया है उसके अनुपालन के प्रयास तक नहीं किया जाता।
यही हाल शिक्षा क्षेत्र का है जहां केंद्र कंप्यूटरीकरण से लेकर रमसा और सर्व शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रम तो चला रहा है, लेकिन बावजूद इसके पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित स्कूलों में बेहतर शिक्षा नहीं मिल पा रही है।
स्वास्थ्य का हाल
केंद्र के प्रोग्राम एनआरएचएम में कई सौ करोड़ का बजट बीते सात वर्षों में खर्च हुआ, लेकिन पहाड़ों मरीजों को इलाज नहीं मिल रहाहै। पर्वतीय जनपदों में चिकित्सकों के 80 फीसदी पद रिक्त पड़े हैं।
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आयुष सेवाओं को सुदृढ़ करने के लिए केंद्र ने नीति बनाई लेकिन राज्य में उसका सही से अनुपालन नहीं हुआ। इमरजेंसी सेवाओं के लिए बनाए गए दर्जन भर ट्रामा सेंटरों में विशेषज्ञ तैनात नहीं है।
केंद्र की निजी भागीदारी से स्वास्थ्य सेवाओं को संचालित करना राज्य में कामयाब होता नहीं दिख रहा है।
शिक्षा सुधार के नहीं हुए प्रयास
राजनीतिक दलों के विधायकों में इस बात की होड़ तो मची रही है कि अपने क्षेत्रों में स्कूलों को अपग्रेड करवाया जाए, लेकिन उनमें मास्टरों की तैनाती पर किसी का ध्यान नहीं है।
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शासन इस बात को मान रहा है कि जिन स्कूलों में छात्र हैं वहां मास्टर तैनात नहीं है। केंद्र की आईसीटी (इंफोरमेशन एंड कंप्यूनिकेशन टेक्नोलाजी) योजना का फेज टू उत्तराखंड में शुरू नहीं हुआ है।
मास्टरों के स्कूलों से गैरहाजिरी को रोकने के लिए केंद्र से आई आनलाइन प्रणाली विकसित करने पर शासन का ध्यान नहीं है।
पहाड़ों में नवोदय विद्यालयों बनाने की योजना खटाई में पड़ी है। सरकार सिर्फ मास्टरों के तबादलों में उलझी रही, जबकि शिक्षा सुधार का कोई प्रयास नहीं हुआ।