कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत का वर्षों पुराना सपना शनिवार को साकार हो गया। तमाम बाधाओं को पार कर वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन मुस्कराते हुए सत्ता के जिस ताज को उन्होंने पहना है वह फूलों से भरा कदापि नहीं है।
सीएम के तौर पर रावत के सामने कितनी चुनौतियां हैं, वह शनिवार को नजदीक से जान और समझ गए होंगे। पार्टी हाईकमान से मुख्यमंत्री के लिए नाम तय होने के बावजूद शपथ शाम साढ़े छह बजे के बाद ही ले पाए।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद हरीश रावत प्रदेश के आठवें मुख्यमंत्री बने हैं। जिन हालात में यह कुर्सी उन्होंने संभाली है, उससे उनके सामने पार्टी के अंदर और बाहर के साथ ही राज्य के विकास की चुनौतियां हैं। चार ऐसी कठिनाइयां हैं जिन्हें यदि उन्होंने जीत लिया तो अपना कार्यकाल पूरा कर लेंगे। यदि चूके तो प्रदेश में सियासी अस्थिरता की आशंका बनी रहेगी।
पहली चुनौतीः त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव
हरीश रावत के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करना जितना कठिन था, उससे अधिक उस पर बैठकर काम करना होगा। मुख्यमंत्री बनने के बाद सबसे पहले उनके सामने प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने की चुनौती होगी।
इस चुनाव में यदि कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन नहीं किया तो उसकी नाकामी का ठीकरा रावत के सिर ही फूटेगा। ऐसे में उनके विरोधी इसे मुद्दा बनाएंगे और उनकी घेराबंदी तेज हो जाएगी। इस चक्रव्यूह से रावत कैसे निकलेंगे, आने वाले दिनों में इसे देखना रोचक और रोमांचक होगा।
दूसरी चुनौतीः लोकसभा चुनाव
इसी साल अप्रैल-मई में लोकसभा के चुनाव होने हैं। रावत के लिए यह चुनाव सबसे बड़ी चुनौती होगी। हालांकि रावत के खासमखास प्रदीप टम्टा का दावा है कि अब कांग्रेस प्रदेश की पांचों लोकसभा सीटें जीतेगी।
लोकसभा में चुनावी सफलता हासिल करने के नाम पर ही तो कांग्रेस हाईकमान ने रावत को मुख्यमंत्री बनाया है। यदि वह पांच में से तीन सीट भी पार्टी की झोली में नहीं डाल पाए तो उनकी सीएम की कुर्सी खतरे में पड़ जाएगी। उनके विरोधी सक्रिय हो जाएंगे और उनका काम करना मुश्किल हो जाएगा।
तीसरी चुनौतीः चारधाम यात्रा
हरीश रावत के लिए तीसरी सबसे बड़ी चुनौती होगी चारधाम यात्रा का सुचारु संचालन। पिछले साल जून माह में आई आपदा के बाद से प्रदेश की सड़कें बदहाल हैं। उन पर पैदल चलना भी मुश्किल है।
अप्रैल में चारों धामों के कपाट खुलने की तिथि घोषित हो जाएगी। इसी के साथ आरंभ होनी है चारधाम यात्रा। बिना सड़कों के यात्री धामों तक पहुंचेंगे कैसे? यह बड़ा सवाल है। माना जा रहा है कि बहुगुणा की कुर्सी जाने के पीछे जून में आई आपदा ही मुख्य वजह रही। इसी दौरान सरकार के कामकाज से खराब हुई छवि का लाभ रावत ने उठाया है।
अब इसी आपदा के दंश रावत को भी झेलने पड़ेंगे। सीएम बनने के बाद उन्हें यात्रा के सफल संचालन के लिए मुश्किल से दो माह मिलेंगे। इस अवधि में चार धामों को जाने वाली सड़कों को ठीक कराकर यात्रियों को धामों तक पहुंचने की व्यवस्था कर दी तो रावत के खाते में न केवल बड़ी उपलब्धि जुड़ जाएगी, बल्कि लाखों लोगों को रोजगार भी मिलेगा। इसके बाद उनकी कुर्सी को हिलाना मुश्किल हो जाएगा।
चौथी चुनौतीः छह माह में विधायक बनना
हरीश रावत इस समय हरिद्वार संसदीय सीट से सांसद हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें छह माह के अंदर विधायक बनना होगा। इसके लिए उन्हें किसी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना होगा। यह सीट कौन सी होगी?
कौन सा विधायक अपनी सीट उनके लिए छोड़ेगा, यह बड़ा सवाल है। हालांकि रावत के लिए कई विधायक अपनी सीट छोड़ सकते हैं लेकिन इससे उनके खेमे वाले विधायकों की संख्या कम हो जाएगी। समर्थक विधायकों की संख्या कम होने के कारण उन्हें सरकार चलाने में बार-बार दिक्कतें आएंगी।