उच्च न्यायालय के आदेश के क्रम में फिर सत्तासीन हुए हरीश रावत की इस ताजपोशी की कहानी अजीब मोड़ पर है।
न्यायालय का निर्णय हुआ, लेकिन राजभवन ने इस आदेश के अनुपालन के क्रम में सार्वजनिक रूप से कोई आदेश जारी नहीं किया और वहीं स्वत: ही सरकार ने कामकाज करना शुरू कर दिया। संवैधानिक तरीका यही है कि जब किसी राज्य में सरकार का गठन होता है तो उसका विधिवत आदेश राजभवन जारी करता है।
उधर नैनीताल में उच्च न्यायालय ने आदेश किया और इधर देहरादून में सरकार ने स्वत: ही काम करना शुरू कर दिया। जब राष्ट्रपति शासन लागू हुआ था तब भी मंत्रिमंडलीय सचिव की तरफ से एक औपचारिक आदेश हुआ था, जिसके तहत मुख्यमंत्री व उनके कैबिनेट सहयोगियों को कार्यमुक्त किया गया था।
अब जबकि उच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति शासन को खारिज कर दिया तो राजभवन या शासन की तरफ से अभी तक अधिकृत तौर पर यह आदेश सार्वजनिक नहीं किया गया कि न्यायालय के आदेश के क्रम में सरकार को बहाल कर दिया है।
शासन में कोई बोलने को तैयार नहीं है और राजभवन ने देर शाम मुलाकात की जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की है उसमें हरीश रावत को निवर्तमान मुख्यमंत्री लिखा है। संवैधानिक तौर पर मुख्यमंत्री को सारी शक्ति संविधान से राज्यपाल के माध्यम से मिलती है।