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महाकुंभ 2021ः निजाम के धोखे के बाद हुआ जूना अखाड़े का उदय, संधि की आड़ में दिया था संन्यासियों को जहर

Fri, 05 Mar 2021 01:02 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal जितेंद्र जोशी, अमर उजाला, हरिद्वार
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जूना अखाड़ा - फोटो : अमर उजाला
भैरव अखाड़े (जूना अखाड़ा) के संतों ने जंग के दौरान अपने युद्ध कौशल से राजस्थान के जूनागढ़ के निजाम को घुटने टेकने पर मजबूर दिया था। संन्यासियों के पराक्रम के आगे मुगल सेना के पैर उखड़ गए। इसके बाद निजाम ने सन्यासियों को संधि के लिए बुलाया और धोखे से भोजन में जहर दे दिया, लेकिन भोजन न करने वाले कुछ संन्यासी बच गए। इन्होंने ही बाद में श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े का गठन किया। वर्ष 1145 में उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में अखाड़े का पहला मठ स्थापित किया गया। श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा शिव संन्यासी संप्रदाय के सभी सात अखाड़ों में सबसे बड़ा है। इसमें करीब पांच लाख नागा साधु है। अखाड़े के इष्टदेव रुद्रा अवतार गुरु दत्तात्रेय भगवान हैं। अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक श्रीमंहत हरि गिरि ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में बताया कि जूना अखाड़े का गौरवशाली इतिहास उसकी पहचान है। आठवीं शताब्दी में भैरव अखाड़े (जूना अखाड़ा) की शुरुआत हुई थी। जब देश मुगलों के आतंक से त्रस्त था तो अखाड़े के संन्यासियों ने लोगों की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए। श्रीमहंत हरि गिरि बताते हैं कि अखाड़े के सन्यासियों से युद्ध के दौरान जूनागढ़ के निजाम को मुंह की खानी पड़ी। तब निजाम ने संन्यासियों को जूनागढ़ सौंपने की बात कहते हुए भोजन पर आमंत्रित किया।
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जूना अखाड़ा - फोटो : अमर उजाला
इस दौरान निजाम ने धोखे से सन्यासियों को भोजन में जहर मिलाकर दे दिया, लेकिन नियमानुसार पुजारी, कोठारी सहित निगरानी में जुटे संन्यासियों ने भोजन नहीं किया। ऐसे में वे बच गए। श्री महंत हरि गिरि ने बताया कि इन संन्यासियों ने बाद में जूना अखाड़े का गठन कर कर्णप्रयाग में पहले मठ की स्थापना की।
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जूना अखाड़ा - फोटो : अमर उजाला
श्रीमहंत हरि गिरि ने बताया अखाड़े का संन्यासी बनने के लिए 12 वर्षों का संकल्प पूरा करना पड़ता है। संकल्प लेने वाला 12 वर्षों तक ब्रह्मचारी कहलाता है। इस दौरान उसको अखाड़े के नियम और परंपराएं सिखाई जाती हैं।

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जूना अखाड़ा - फोटो : अमर उजाला
जब ब्रह्मचारी 12 वर्ष का संकल्प पूरा कर लेता है तब उसे कुंभ के दौरान नागा साधु के रूप में दीक्षा दी जाती है। नागा संन्यासी खानपान और विचार दोनों पर संयम रखते हैं। नागा संन्यासी त्रिशूल, तलवार, शंख और रुद्राक्ष आदि धारण कर अपने दर्जे को दर्शाते हैं।
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जूना अखाड़ा - फोटो : अमर उजाला
श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े के अधिकांश आश्रम दुर्गम क्षेत्रों में हैं। यहां रहना बेहद मुश्किल है, लेकिन अखाड़े के संन्यासी कठोर अनुशासन के बीच इन स्थानों पर रहते हैं। महिला नागा संन्यासियों को अखाड़े में पूरा सम्मान मिलता है। वस्त्रधारी महिला संन्यासी माईवाड़ा में रहती हैं। इनको योग्यता अनुसार महंत और महामंडलेश्वर का दर्जा भी दिया जाता है।
 
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जूना अखाड़ा - फोटो : अमर उजाला
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जूना अखाड़े का मुख्यालय है। वहीं, हरिद्वार के माया मंदिर के पास अखाड़े का आश्रम भी है। हर अखाड़े में आध्यात्मिक और कार्यकारी मुखिया होते हैं। आध्यात्मिक मुखिया आचार्य महामंडलेश्वर होते हैं। इस समय स्वामी अवधेशानंद गिरी अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर हैं। इसके बाद महामंडलेश्वर, श्रीमहंत और महंत आदि व्यवस्थाओें का संचालन करते हैं।
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