अंतिम शाही स्नान पर श्रद्धालुओं को संतों का राजसी ठाठबाट और वैभव देखने को नहीं मिला। कोविड नियमों का पालन करते हुए संत बेहद सादगी से स्नान के लिए पहुंचे। जुलूस में न बैंड बाजे थे न राजसी रथ, केवल अखाड़ों की धर्म ध्वजाएं, इष्टदेव की पालकी और अखाड़ों के पंच परमेश्वर शमिल रहे। हरकी पैड़ी, मालवीय घाट, नाई सोता, पंतद्वीप, सुभाष घाट, शिव घाट, बिरला घाट, अलकनंदा घाट, प्रेम नगर घाटों पर देर शाम तक श्रद्धालुओं ने कम संख्या में गंगा स्नान किया। मेलाधिकारी दीपक रावत, आईजी कुंभ संजय गुंज्याल, डीएम सी रविशंकर, एसएसपी डी सेंथिल अबूदई कृष्णराज एस और अपर मेलाधिकारी डॉ. ललित नारायण मिश्रा, हरबीर सिंह समेत कई अधिकारी जायजा लेते रहे।
संतों ने किया कोविड नियमों का पालन
सभी संन्यासी और बैरागी अखाड़ों के संतों ने कोविड नियमों का पालन किया। अधिकांश संत मास्क पहने हुए थे। पूजा-अर्चना और शाही स्नान के दौरान भी शारीरिक दूरी का पालन किया गया। संतों ने स्नान में अधिक समय भी नहीं लगाया। इससे अखाड़ों के स्नान की व्यवस्थाएं सुचारु रूप से चलती रही।
शताब्दी का दूसरा महाकुंभ पर्व संतों के सामान्य शाही स्नान के साथ निर्विघ्न संपन्न हो गया है। तीन वर्ष बाद फिर प्रयागराज में मिलने की कामना के साथ सभी तेरह अखाड़ों के संत अब अपने-अपने डेरों की ओर रवाना हो जाएंगे। संन्यासी अखाड़ों के तंबू कढ़ी-पकौड़ा के साथ पहले ही उखड़ चुके हैं। अखाड़ों की धर्म ध्वजाएं लेकर रमता पंचों ने कुंभनगरी से अगली यात्रा प्रारंभ कर दी है। अब बैरागी खालसों और श्रीमहंतों के लौटने की बारी है।
कोरोना जैसी विश्वव्यापी महामारी के बीच अनेक प्रतिबंधों के साथ हरिद्वार महाकुंभ-2021 इतिहास में दर्ज हो गया। यह भी साबित हुआ कि 12 के बजाय 11 वर्ष में कुंभ का आना कुछ अनहोनी साथ लाता है। इससे पहले वर्ष 1938 में 11 साला कुंभ पड़ा था। तब भयंकर आगजनी और नौकाओं पर बना पुल टूटने से करीब दो हजार यात्री अकाल मृत्यु का शिकार हो गए थे।
इस बार यात्रियों की जनहानि किसी दुर्घटना के कारण नहीं हुई, लेकिन कोरोना के चलते कड़े प्रतिबंधों के कारण लाखों यात्री नहीं पहुंच पाए। हरिद्वार के वर्तमान कुंभ में संन्यासी और बैरागी अखाड़ों के बीच शताब्दियों तक चलते रहे विरोध फिर से उभर आए। ये विरोध वर्ष 1954 में सभी 13 अखाड़ों की अखाड़ा परिषद बनने के बाद समाप्त हो गए थे, लेकिन इस बार विरोध के सुर इतने तेज हुए कि अखाड़ा परिषद ही दोफाड़ हो गई। संगम तट पर तीन वर्ष बाद फिर से मिलने के संकल्प के साथ विदा हुआ हरिद्वार महाकुंभ।