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हरिद्वार महाकुंभ 2021: चैत्र पूर्णिमा पर सभी अखाड़ों का अंतिम शाही स्नान संपन्न, पहुंचे 30 हजार श्रद्धालु

Tue, 27 Apr 2021 09:01 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, हरिद्वार

सार

  • हरिद्वार मेला पुलिस से जारी आंकड़ों के अनुसार, दोपहर तीन बजे तक करीब 30 हजार श्रद्धालुओं ने स्नान किया। स्नान करने वाले ज्यादातर श्रद्धालु स्थानीय थे।
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अंतिम शाही स्नान में बेहद कम पहुंचे श्रद्धालु - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान के बाद महाकुंभ में चैत्र पूर्णिमा का अंतिम शाही स्नान प्रतीकात्मक रूप से किया गया। सभी 13 अखाड़ों के 1600 संतों ने कोविड महामारी के अंत और विश्वकल्याण की कामना के साथ शाही स्नान किया। देश के विभिन्न राज्यों में कोविड कर्फ्यू और महामारी के डर का असर शाही स्नान पर भी साफ देखने को मिला। शाम तक करीब 30 हजार श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान किया। इसमें अधिकांश स्थानीय श्रद्धालु ही शामिल रहे।

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हरिद्वार महाकुंभ 2021 : चैत्र पूर्णिमा पर अखाड़ों के साथ स्नान के लिए नहीं जाएंगे आम लोग 

महाकुंभ के अंतिम शाही स्नान पर कोविड महामारी का पूरा असर दिखा। अधिकारिक रूप से तो महाकुंभ 30 अप्रैल को संपन्न होगा, लेकिन अखाड़ों के महाकुंभ का समापन अंतिम शाही स्नान के साथ हो चुका है। मंगलवार को ब्रह्ममुहूर्त से लेकर सुबह नौ बजे तक श्रद्धालुओं ने हरकी पैड़ी पर डुबकी लगाई। मेला अधिकारी दीपक रावत और आईजी कुंभ संजय गुंज्याल ने गंगा की पूजा-अर्चना और दुग्धाभिषेक कर शाही स्नान व महाकुंभ के सकुशल संपन्न होने की कामना की। इसके बाद मेला पुलिस ने हरकी पैड़ी को खाली कराकर अखाड़ों के लिए आरक्षित कर दिया। सुबह 9.20 बजे पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी और श्री तपोनिधि आनंद अखाड़े के संतों ने ब्रह्मकुंड में शाही स्नान किया। दोनों अखाड़ों के शाही स्नान करने वाले संतों ही संख्या 50 के करीब रही। इसके बाद श्रीपंच दशनाम जूना, श्रीपंच अग्नि, श्रीपंच दशनाम आह्वान और किन्नर अखाड़े के करीब 300 संतों ने ब्रह्मकुंड में शाही स्नान किया।
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हरिद्वार महाकुंभ 2021 : चैत्र पूर्णिमा पर साढ़े नौ बजे तक हरकी पैड़ी पर शाही स्नान कर सकेंगे श्रद्धालु


श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी और श्री पंचायती अटल अखाड़े के 50 संतों ने स्नान किया। तीनों बैरागी अणि अखाड़ों में पहले श्री पंच निर्मोही फिर श्रीपंच दिगंबर अणि और अंत में श्रीपंच निर्वाणी के करीब एक हजार संतों ने जय श्रीराम और जय श्रीकृष्ण के जयकारों के साथ उत्साहपूर्वक शाही स्नान किया। अंतिम क्रम में श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन, श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन और श्री पंचायती निर्मल अखाड़े के करीब 200 संतों के स्नान के साथ शाही स्नान संपन्न हुआ।

राजसी ठाठबाट और वैभव देखने को नहीं मिला

अंतिम शाही स्नान पर श्रद्धालुओं को संतों का राजसी ठाठबाट और वैभव देखने को नहीं मिला। कोविड नियमों का पालन करते हुए संत बेहद सादगी से स्नान के लिए पहुंचे। जुलूस में न बैंड बाजे थे न राजसी रथ, केवल अखाड़ों की धर्म ध्वजाएं, इष्टदेव की पालकी और अखाड़ों के पंच परमेश्वर शमिल रहे। हरकी पैड़ी, मालवीय घाट, नाई सोता, पंतद्वीप, सुभाष घाट, शिव घाट, बिरला घाट, अलकनंदा घाट, प्रेम नगर घाटों पर देर शाम तक श्रद्धालुओं ने कम संख्या में गंगा स्नान किया। मेलाधिकारी दीपक रावत, आईजी कुंभ संजय गुंज्याल, डीएम सी रविशंकर, एसएसपी डी सेंथिल अबूदई कृष्णराज एस और अपर मेलाधिकारी डॉ. ललित नारायण मिश्रा, हरबीर सिंह समेत कई अधिकारी जायजा लेते रहे। 

संतों ने किया कोविड नियमों का पालन
सभी संन्यासी और बैरागी अखाड़ों के संतों ने कोविड नियमों का पालन किया। अधिकांश संत मास्क पहने हुए थे। पूजा-अर्चना और शाही स्नान के दौरान भी शारीरिक दूरी का पालन किया गया। संतों ने स्नान में अधिक समय भी नहीं लगाया। इससे अखाड़ों के स्नान की व्यवस्थाएं सुचारु रूप से चलती रही।
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तीन वर्ष बाद प्रयाग में मिलने की कामना के साथ हरिद्वार महाकुंभ संपन्न

शताब्दी का दूसरा महाकुंभ पर्व संतों के सामान्य शाही स्नान के साथ निर्विघ्न संपन्न हो गया है। तीन वर्ष बाद फिर प्रयागराज में मिलने की कामना के साथ सभी तेरह अखाड़ों के संत अब अपने-अपने डेरों की ओर रवाना हो जाएंगे। संन्यासी अखाड़ों के तंबू कढ़ी-पकौड़ा के साथ पहले ही उखड़ चुके हैं। अखाड़ों की धर्म ध्वजाएं लेकर रमता पंचों ने कुंभनगरी से अगली यात्रा प्रारंभ कर दी है। अब बैरागी खालसों और श्रीमहंतों के लौटने की बारी है।

कोरोना जैसी विश्वव्यापी महामारी के बीच अनेक प्रतिबंधों के साथ हरिद्वार महाकुंभ-2021 इतिहास में दर्ज हो गया। यह भी साबित हुआ कि 12 के बजाय 11 वर्ष में कुंभ का आना कुछ अनहोनी साथ लाता है। इससे पहले वर्ष 1938 में 11 साला कुंभ पड़ा था। तब भयंकर आगजनी और नौकाओं पर बना पुल टूटने से करीब दो हजार यात्री अकाल मृत्यु का शिकार हो गए थे।

इस बार यात्रियों की जनहानि किसी दुर्घटना के कारण नहीं हुई, लेकिन कोरोना के चलते कड़े प्रतिबंधों के कारण लाखों यात्री नहीं पहुंच पाए। हरिद्वार के वर्तमान कुंभ में संन्यासी और बैरागी अखाड़ों के बीच शताब्दियों तक चलते रहे विरोध फिर से उभर आए। ये विरोध वर्ष 1954 में सभी 13 अखाड़ों की अखाड़ा परिषद बनने के बाद समाप्त हो गए थे, लेकिन इस बार विरोध के सुर इतने तेज हुए कि अखाड़ा परिषद ही दोफाड़ हो गई। संगम तट पर तीन वर्ष बाद फिर से मिलने के संकल्प के साथ विदा हुआ हरिद्वार महाकुंभ।
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