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गुरुओं के इन ‘गुरू’ की उम्र जानकर हैरान हो जांएगे आप

Fri, 05 Sep 2014 04:17 PM IST
प्रवेश कुमारी/ अमर उजाला, देहरादून
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गुरू यानी वह शख्स, जो हमें सिखाए। गुरू केवल स्कूल में पढ़ाने वाला शिक्षक ही नहीं होता। शिक्षकों के भी गुरू होते हैं और इस शिक्षक दिवस पर आपको मिलवाएंगे कुछ ऐसे ‘गुरू’ से, जिनकी उम्र और अनुभव दोनों कम है, लेकिन जिन्हें उनके ‘गुरू’ मानते हैं।
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बेशक मैं कोच हूं, लेकिन समर्पण की बात करूं तो वह मैंने अपनी ट्रेनी प्रेरणा गुप्ता से सीखी। वह मेरी गुरू है। आज तीन साल बीत चले हैं। प्रेरणा नेशनल लेवल पर 7-8 मेडल्स जीत चुकी है।

जूनियर इंडियन वूमेन शूटिंग टीम की सदस्य है और दुबई में अक्तूबर माह के अंत में होने वाली वर्ल्ड यूनिवर्सिटी शूटिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लेने भी जा रही है। उसने शूटिंग सीखनी शुरू की तो पिता उसे कार से छोड़ने आते थे।
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समय बीता तो उनकी अपनी व्यस्तता हो गई। बल्लीवाला चौक से दो वाहन बदलकर वह तेगबहादुर रोड के पास स्थित शूटिंग इंस्टीट्यूट पहुंचती। आंधी, बारिश, धूप कभी उसे रुकते या लेट होते नहीं देखा।

वरना अमूमन ज्यादातर ट्रेनी आते, 10 गोलियां चलाते चले जाते। मौसम को देखकर प्लान करते। प्रेरणा से ली यह सीख मुझे हमेशा बेहतर करने को प्रेरित करती है।
- मयंक मारवाह, शूटिंग कोच

बच्चियों से सीखी हॉकी की बारीकी

यह 1988 की बात थी। मैं नेशनल स्पोर्ट्स टैलेंट कांटेस्ट (एनएसटीसी) से निकले बच्चों को एमकेपी में हॉकी सिखाने जाया करता था।

तकनीकी रूप से मजबूत बनाने के लिए मैं उन्हें कुछ तकनीकी पक्ष बता रहा था, लेकिन बच्चे उसे समझ नहीं पा रहे थे। एक दिन शाम को तीसरी, चौथी की तीन चार खिलाड़ियों को ड्रिबलिंग, रोलिंग करते देखा।

यह मेरा तरीका नहीं था, यह उन्हीं बच्चों को सिंपल मैथड था। मैं आश्चर्यचकित रह गया। मैं बड़े बच्चों को तकनीकी रूप से बताकर भी वह नहीं करा पा रहा था, जो यह खिलाड़ी खुद कर रही थीं।

आखिर मैंने दूसरे बच्चों को सिखाने के लिए यही सिंपल मैथड अपनाया। अपने कोच की गुरू बनने वालीं यह खिलाड़ी थीं अनुराधा रावत, रेखा नेगी, सुनीता दलाल। इनकी सीख हमेशा याद रहती है। हमेशा आसान तरीके से बच्चों की मुश्किल हल करने की कोशिश करता हूं।
- पीके महर्षि, हॉकी कोच

मार्केट में छाए हैं मोटिवेशनल गुरू

दुनिया भर में नाम करने वाली मणिपुर की बॉक्सर मैरीकाम की आत्मकथा ‘अनब्रेकेबल’ न केवल उनके जीवन की कहानी कहती है, बल्कि आगे बढ़ने की इच्छा रखने वाले लोगों को भी एक सीख देती, राह दिखाती है।

इस तरह की ढेर सारी किताबें पाठकों के गुरू और गाइड की भूमिका में हैं। दून का मार्केट इस वक्त ऐसे लेखकों की बेस्ट सेलर्स से भरा पड़ा है, जो लोगों के लिए गुरू बनी हैं। मैरीकाम की ही तरह अपने अभिनय की छाप छोड़ने वाली गुल पनाग भी ‘द विल टू विन’ के जरिए मार्केट में छाई हुई हैं।

वह कामयाब बनने की जिद ठाने लोगों की गुरू बनी हैं। सालों बाद भी डेल कारनेगी मोटिवेशनल गुरू के तौर पर मार्केट पर राज कर रहे हैं। उनकी नई किताब ‘द लीडर इन यू’ युवाओं के लिए प्रेरणा बनी है।
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पाठकों की गुरू बनी हैं किताबें

वहीं, कुछ समय से बेहद चर्चा में रहे रोबिन शर्मा ‘द ग्रेट नेस गाइड’ के साथ हाजिर हैं। जोसेफ मर्फी की ‘द पावर आफ ए कांशियस माइंड’, राबर्ट शुल्डर की ‘बी हैप्पी एटीट्यूड’ जैसी किताबें भी लोगों को राह दिखाने का कार्य कर रही हैं।

स्टीव की ‘सेवन हैबिट्स आफ सक्सेसफुल पीपुल’ भी पाठकों की गुरू बनी है। कैंसर से लड़कर जिंदगी में विजेता बनकर लौटे मशहूर क्रिकेटर युवराज सिंह की आटोबायोग्राफी भी बीमारी से जूझ रहे लोगों को उठ खड़े होने की राह दिखाती गुरू ही है।

इस वक्त सबसे ज्यादा किताबें या पाजिटिविटी आधारित बिक रही हैं या फिर एंटरप्रेन्योरशिप से जुड़ीं। कामयाब बनने के मंत्र सिखातीं किताबें पाठकों के लिए गुरू बनी हैं।
- उपेंद्र, नटराज पब्लिशर्स, राजपुर रोड
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