सीमा पर चीन की बढ़ती दखलअंदाजी पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सोममार को सख्त तेवर में चेतावनी दी कि अगर चीन ने हमारी सीमा के भीतर सड़कें बनाईं तो उन्हें तोड़ दिया जाएगा लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी मौजूं हो गया है कि हम अपनी सीमा पर सैन्य जरूरत भर की सड़कें कब बना पाएंगे।
भारतीय सीमा के पास चीन का तेजी से फैलता सड़कों का जाल बरसों से केंद्र की चिंताएं तो बढ़ा ही रहा है, लेकिन सीमांत सड़क निर्माण में लगी एजेंसियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा।
चीन से बड़ी चिंता दरअसल यही सुस्ती है। चीन को चेताने से ज्यादा जरूरी सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) सहित उन निर्माण एजेंसियों को चुस्त करने की है जो तय समयसीमा के दो बरस बाद भी सड़कों का 50 फीसदी निर्माण कार्य भी पूरा नहीं कर सकीं।
440 किमी में केवल 60 किमी सड़कें पूरी
चीन सीमा पर सामरिक महत्व की 73 सड़कों में से 19 सड़कें (440 किलोमीटर लंबाई) उत्तराखंड में बन रही हैं, जिसमें से महज 55 किलोमीटर सड़क ही बीआरओ निर्धारित समय के भीतर पूरी कर पाया है।
उत्तराखंड के साथ चीन के 350 किलोमीटर लंबे बार्डर तक सैन्य पहुंच आसान बनाने के लिए 19 रोड प्रस्तावित हैं। उत्तराखंड के अलावा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्कम और अरुणाचल प्रदेश में कुल 54 सड़कें बनाई जा रही हैं।
राज्य के उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ में बनने वाली 440 किलोमीटर लंबी सड़कों पर 190 किलोमीटर पर खुदाई और कटान ही हो पाया है, जबकि 60 किलोमीटर सड़कें पक्की की गई हैं।
चार साल बढ़कर 2016 हुई डेडलाइन
सीमा पर आईटीबीपी के अधिकार क्षेत्र से लेकर 46 किलोमीटर लंबी चार सड़कें सीपीडब्ल्यूडी को सौंपी गई हैं, जिनकी कटाई पूरी कर ली गई है, लेकिन पक्का नहीं किया गया है। यही स्थिति अन्य राज्यों में सीमांत सड़क निर्माण की है, जिसके चलते अब रक्षा मंत्रालय ने बीआरओ के लिए वर्ष 2016 की डेडलाइन तय की है।
सड़कों पर इतनी सुस्ती
भारत चीन सीमा पर सामरिक महत्व की 3410 किलोमीटर लंबी 61 सड़कें सीमा सड़क संगठन के पास हैं, जिसमें से 17 सड़कों का निर्माण ही पूरा हुआ है। बीआरओ केवल 590 किलोमीटर सड़कें चीन सीमा के साथ सटे पांच राज्यों में अब तक पूरी कर पाया है। जिसमें जम्मू कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में सर्वाधिक निर्माण हुआ है। अन्य 12 सड़कों को सीपीडब्ल्यूडी सहित कुछ और निर्माण एजेंसियां कार्य कर रही हैं।
ये आ रही हैं दिक्कतें
- वन पर्यावरण विभाग की अनापत्ति देने में देरी
- खनन और विस्फोट संबंधी अनुमति देने में देरी
- वन आरक्षित क्षेत्र और भूमि हस्तांतरण में देरी
- सड़क निर्माण सामग्री की उपलब्धता नहीं
- आपदा से हुए नुकसान से लटका रहा कार्य
चीन का रेल और हवाई नेटवर्क बहुत आगे
सीमा पर अपनी तरफ चीन ने पूरी तरह से विकास किया हुआ है। उसके पांच हवाई अड्डे हैं और लहासा तक रेलवे लाइन का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है। सड़कों का जाल पूरी तिब्बत सीमा तक फैल चुका है। इसके अलावा चीन के पांच सैन्य माउंटेन डिवीजन सीमा के उस पार तैनात हैं।
इनका है कहना
सड़कों के निर्माण में सुस्ती की वजह वित्तीय स्वीकृतियों में देरी, फॉरेस्ट और वाइल्ड लाइफ से संबंधित क्लियेरेंस लटके रहना है। बीआरओ के कामकाज में ब्यूरोक्रेसी के दखल को कम करने के साथ प्रस्तावों पर स्वीकृतियां देने से ही सामरिक महत्व की सड़कें तेजी से बन सकती हैं।
-लेफ्टिनेंट जनरल एमसी बधानी (रिटायर), पूर्व इंजीनियर इन चीफ
सीमांत इलाकों से हो रहा पलायन देश की सुरक्षा के लिए घातक है। सीमाओं पर बसे लोग वहां की स्थिति की अहम जानकारियां प्रशासन एवं सुरक्षा एजेंसियों को मुहैया करवाते रहे हैं।
-उत्तराखंड के राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी