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शेर सुनकर साहिब रुआंसे हो गए...

Thu, 18 Sep 2014 03:10 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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काफी लंबी लड़ाई लड़ने के बाद जब कर्मचारियों को लगा कि तबादला नहीं रुकेगा तो उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। लेकिन दिल अभी तक मसोस रहा है।
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पटल की कुर्सी छिनी तो धन का नुकसान हो गया और पटल बदला तो दोस्त चले गए। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अफसर इससे बहुत परेशान हैं। पहले दफ्तर में ही बैठे रहते थे, अब बेचैनी में बाहर घूमा करते हैं। कभी इस दफ्तर में तो कभी उस दफ्तर में।

एक दिन भटकते-भटकते वह छोटे हाकिमों के चैंबर में पहुंच गए। एक कमरे में दो छोटे हाकिम बैठते हैं। जब चाय का वक्त होता है तो तीसरे छोटे हाकिम अपने कमरे से निकल कर आ जाते हैं। तीनों छोटे हाकिम बैठे चाय की चुस्की ले रहे थे। बाहर बारिश की बौछार थी।
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वरिष्ठ प्रशासनिक अफसर पहुंचे तो किसी जमाने में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के टुचपुंजिया शायर कहे जाने वाले छोटे हाकिम ने मीर तकी मीर का शेर सुनाकर कटाक्ष किया-‘बहार बे-सिपर-ए-जामो-यार गुजरे है, नसीम तीर सी सीने के पार गुजरे हैं।’

वरिष्ठ प्रशासनिक अफसर को रुआंसी मुस्कराहट आई, बोले-आप लोग हाकिम हैं साहब जो कहें सब ठीक ही है। फिर बाहर आ गए। यह संवाददाता छोटे हाकिमों के पास से बाहर निकला तो वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने आवाज दी। बताइये? उस शेर का मतलब क्या था? सिपर माने ढाल, नसीम माने हवा।
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शेर का मतलब यह है कि इस बार बहार का हमला रोकने के लिए शराब और यार की ढाल नहीं है। ढाल न होने से हवा तीर की तरह सीना भेद के पार हो जा रही है।

इस पर हल्का से मुस्कराए, बोले-बात तो सही है। दरअसल वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी पहले आबकारी विभाग में थे। उनके साथ महिला सहकर्मी का तबादला भी दूसरे पटल में हो गया।
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