उत्तराखंड प्रशासन के दो मुखियाओं में आजकल शीतयुद्ध चल रहा है। पहले मिलना-जुलना बंद हुआ, फिर जुबानबंदी हो गई। अब हुक्मनामा को लेकर अहम टकरा रहे हैं।
सुपर कॉप हाकिम की हुक्मउदूली कर रहे हैं। हाकिम के पास मजिस्ट्रीयल पावर है जो कलम से निकलता तो सुपर कॉप के पास डंडा है। हालत यह है कि सुपर कॉप हाकिम की बात पर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं। इसका असर नीचे तक आ रहा है।
मातहतों ने भी अपने इगो का दरबार खोल रखा है। एक छोटे हाकिम ने संतरी मांगा तो सुपर कॉप ने ध्यान ही नहीं दिया। इससे कई छोटे हाकिमों के तन-बदन में आग लग गई पर करें क्या? हिफाजत के लिए कोई बंदा तो चाहिए ही।
इस पर तेज दिमाग हाकिम ने एक रास्ता निकाला है। कल तक जो फोर्स सुपर कॉप की निगाह में थर्ड क्लास थी। उसे हाकिम ने अहमियत दे दी है। अब यह फोर्स छोटे हाकिमों के साथ रहेगी। इतना ही नहीं कानून व्यवस्था भी संभालेगी।
उसके पास डंडा भी रहेगा और बंदूक भी। छोटे हाकिमों का कहना है कि हमारा पावर तब पता चलेगा जब कहीं बिना अनुमति के लाठीचार्ज होगा।