देहरादून के छोटे हाकिम आजकल परेशान हैं। उनके पास जमीन के विवाद के बहुत मामले आ रहे हैं। सारे शिकायती पत्रों पर वह लिख दे रहे हैं कि तहसील जाओ, मातहत को बताओ।
आपके काम के लिए तो ही यहां बैठे हैं
इसके साथ ही वह शिकायत कर्ता से खैरियत पूछते हैं। कहते हैं कि बाल-बच्चे ठीक हैं। शिकायतकर्ता हाथ जोड़ता है तो कहते हैं अरे क्या बात कर रहे हैं भाई साहब। आपके काम के लिए तो ही यहां बैठे हैं। हम तो आपके सेवक हैं।
उसके जाते ही कहते हैं कि ये.....हैं। सब फ्राड हैं। भाईसाहब इस कुर्सी पर बैठना कांटों का ताज पहनने जैसा है। एक दिन प्रदेश के मुखिया का फोन आया। मामला जमीन के विवाद का ही था।
फोन पर तो वह हंस-हंसकर बात करते रहे लेकिन जैसे ही फोन कटा पहले एकदम संजीदा हुए, फिर गाली बकने लगे। उनका यह मूड बना ही था कि जिस व्यक्ति की सिफारिश की गई थी वह आ गया। छोटे हाकिम ने अपने को एकदम स्विच ओवर कर लिया।
ठठाकर हंसे, तपाक से गले मिले। फिर बोले-बड़े भाई बहुत दिनों में दर्शन दिए। हफ्ते में एक-आध बार आ जाया करिये। पता नहीं कब तक इस सीट पर हैं। सामने वाले साहब ने बहुत गुरुर भरे अंदाज में कहा-आप जैसे अफसर को कहीं न जाने देंगे।
छोटे हाकिम ने कातर दृष्टि से इधर-उधर देखा। आगंतुक ने अपना काम बताया। छोटे हाकिम ने हर बात पर हां-हां की। सबको चाय पिलाई। आने वाले साहब अपना काम बता कर चले गए। उनके जाते ही इस संवाददाता से बोले- अगर हां-हां न करें तो..तबादला करवा देंगे।