उत्तराखंड की सेहत का ख्याल रखने वाले महकमे में इन दिनों एक लाइजनिंग उस्ताद के पौ बारह हैं। महकमे के ना होकर भी बड़े-छोटे साहबों के करीबी हैं।
‘घर’ के अफसरों को जहां दिनभर खटने के बाद भी बहुधा साहबों की डांट ही नसीब होती है, वहीं उस्ताद जी के लिए किसी भी फाइल पास करवा ले जाना चुटकियों का खेल है। साहबों के इस ‘बाज बहादुर’ से कोई पंगा लेना नहीं चाहता। इनकी आस्था साहब से ऐसी जुड़ी है कि कोई दूसरे अफसर चूं नहीं कसते।
अब तो माननीय भी इनके मुरीद होने लगे हैं। सो इसका फायदा उठाकर अब ये खुद पर बाहरी होने का लगा तमगा हटाने की फिराक में हैं। कहने वाले तो यह तक कहते हैं कि इनकी नेटवर्किंग का फायदा भले महकमे को न हो लेकिन साहबों को मिल रहा है। एक बड़ी परियोजना के प्रशासनिक ओहदे पर इनकी ताजपोशी तक हो सकती है।