उत्तराखंड गठन के 13 साल बाद भी केदारघाटी के सीमांत गांव गोंदार में बिजली नहीं है।
जून 2013 की आपदा ने गांव की कमर तोड़ दी तो केदार वन्य विहार से घिरे गांव का पिछले एक साल से विस्थापन भी नहीं हुआ।
गांव वालों को प्री फेब्रिकेटिड हट भी नसीब नहीं हुई और सड़क भी गांव से 10 किलोमीटर पहले खत्म हो जाती है। एक माह पहले नोटिस देने के बाद भी गोंदार की किसी को परवाह नहीं रही।
लिहाजा पूरे उत्तराखंड ने वोट का धर्म जमकर निभाया गया और गोंदार ने इस महायज्ञ में शामिल होने से ही इनकार कर दिया।
एक ने भी वोट नहीं डाला
गांव के प्रधान के मुताबिक गांव में 183 वोटर हैं। एक ने भी वोट नहीं डाला। गोंदार ने विधानसभा चुनाव 2012 में भी यही किया था।
उस समय भी लोगो ने वोट नहीं दिए। केदारनाथ घाटी में आई आपदा में इस गांव से 12 परिवारों की रोजी रोटी का सहारा छिन गया था।
मदमहेश्वर महादेव की तीर्थयात्रा का अंतिम पड़ाव यह गांव वैसे एक स्वयं सेवी संस्था की ओर से पर्यटक ग्राम घोषित है। पर गांव आजादी के बाद से अब तक का लंबा समय बीत जाने के बाद भी आदिम युग में जी रहा है।
हाल यह है कि गांव तक सड़क नहीं पहुंची है। मधु गंगा पर लगे घराट से गांव को बिजली मिलती थी। जून 2013 की आपदा में यह घराट भी बह गया।
समस्याओं का समाधान नहीं तो मतदान नहीं
सड़क से गांव करीब 10 किलोमीटर दूर है। केदार वन्य विहार में स्थित होने के कारण गांव का विस्थापन भी नहीं हो पा रहा है।
ऐसे में गोंदार ने अपने हिसाब से फिर मतदान का बहिष्कार किया है। हालांकि वोट देने के लिए पूरी चुनाव मशीनरी ने अभियान चलाया था। सरकारी मशीनरी का केदार घाटी पर फोकस भी था।
गोंदार के लोगों ने भी करीब एक माह पहले प्रशासन को नोटिस जारी कर कह दिया था कि समस्याओं का समाधान न हुआ तो मतदान नहीं करेंगे।
नोटा इस्तेमाल तक करने को तैयार नहीं
गांव के प्रधान के मुताबिक किसी ने बात सुनी ही नहीं। एक बार भी कोई यह कहने तक गांव में नही आया कि गोंदार आखिर किन शर्तों पर मानेगा।
गोंदार के वोट न देने को सही नहीं माना जा सकता पर इसके लिए सिर्फ गोंदार के सिर पर दोष मढ़कर किनारे होना भी ठीक नहीं होगा।
पूरे उत्तराखंड में रिकॉर्ड मतदान में इस बात पर भी मंथन होना चाहिए कि अदिम युग में जी रहा गांव नोटा के बारे में जानता है पर नोटा इस्तेमाल तक करने को तैयार क्यों नहीं है।