जबकि कुमाऊं क्षेत्र में मिलम, काली, नरमिक, हीरामण, सोना, पिनौरा, रालम, पोंटिंग, मेओला, सुंदरढूंगा, सुखराम, पिंडारी, कपननी और मैकतोली जैसे बड़े ग्लेशियर हैं। राज्य में इतनी अधिक संख्या में ग्लेशियर होने के बावजूद चुनिंदा दस की ही मॉनिटरिंग वाडिया इंस्टीट्यूट समेत अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों द्वारा की जा रही है।
जिन ग्लेशियरों की मानीटरिंग हो रही है उनमें गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, चौराबाड़ी, दूनागिरी, ढोकरियानी ग्लेशियर शामिल हैं।
पिछले साल चमोली के नीती घाटी में ग्लेशियर टूटने के बाद आई आपदा के बाद इस बात की जरूरत महसूस की जाने लगी कि हिमस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील ग्लेशियरों का निगरानी तंत्र विकसित किया जाए ताकि हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली तबाही पर नजर रखी जा सके। इसी कड़ी में डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की ओर से वाडिया इंस्टीट्यूट के जरिये अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाने को लेकर विस्तृत प्रस्ताव मांगा था जिसे इंस्टीट्यूट की ओर से भेज दिया गया है।
वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के अनुसार उच्च हिमालयीय क्षेत्रों में ग्लेशियरों के आसपास अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाने से आपदा के लिहाज से संवेदनशील ग्लेशियरों में किसी प्रकार की हलचल की जानकारी मिलेगी। साथ ही सीस्मिक डाटा के जरिये भूगर्भीय हलचल व नदियों के जलप्रवाह की भी जानकारी मिलेगी।
जिसके आधार पर संस्थान के वैज्ञानिक डाटा का विश्लेषण का यह पता लगाएंगे कि भविष्य में किस प्रकार की आपदा की आशंका है। उसी के हिसाब से आपदा प्रबंधन विभाग के अधिकारी राहत से जुड़े कार्यों को अंजाम दे सकेंगे।
प्राकृतिक आपदाओें के लिहाज से संवेदनशील ग्लेशियरों की मॉनिटरिंग के साथ ही उनका पूर्व आकलन किया जा सके, इस संबंध में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाने को लेकर विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी को भेज दिया गया है। वहां से जो भी दिशा-निर्देश मिलेंगे, उनके अनुसार आगे का कार्य किया जाएगा।
- डॉ. कालाचांद सांई, निदेशक, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी