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दोस्त की किताब ने खोली खंडूड़ी की पोल

Thu, 01 May 2014 12:15 PM IST
अजित सिंह राठी/अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड में राजनीति के ऊंट ने करवट क्या बदली कि दो बालसखाओं की दोस्ती सियासी अदावत में बदल गई।
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23 बरस पहले केदार सिंह फोनिया ने खुद के लिए मिला लोकसभा का टिकट अपने बालसखा भुवनचंद्र खंडूड़ी को दे दिया था। मगर हालात बदले तो वही फोनिया अब खंडूड़ी को लोकसभा में जाने से रोकने अड़े है।

रिश्तों में खटास उस समय ज्यादा बढ़ी जब खंडू़ड़ी ने पिछले विस चुनाव में फोनिया समेत आधा दर्जन सीटिंग विधायकों के टिकट कटवा दिए।

इसके बाद फोनिया ने उत्तराखंड की राजनीति पर एक किताब लिखकर अपने मन की पीड़ा को बाहर निकाला।

खंडूड़ी के खिलाफ उगल रहे आग

बचपन की दोस्ती उम्र के ऐसे पड़ाव में आकर टूटी जब दोनों को एक दूसरे की जरूरत थी।

आज हालात यह हो गए हैं कि केदार सिंह फोनिया पौड़ी लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी हरक सिंह रावत का चुनाव प्रचार कर रहे है।

वो भी अपने बालसखा खंडूड़ी को हराने के लिए। जनसभाओं में तमाम आरोप लगाकर खंडूड़ी के खिलाफ आग उगल रहे है।
 
हालांकि बहुत लोगों को इस दोस्ती के टूटने का दुख भी है। इसी पीड़ा और भड़ास में फोनिया ने एक किताब लिखी जिसमें खंडूड़ी पर खूब तोहमतें मढ़ी।

फोनिया की किताब के अंश

2007 में बीसी खंडूड़ी के नेतृत्व में भाजपा सरकार का गठित हुई तो स्थाई राजधानी के मुद्दे पर जनरल ने चुप्पी साध ली। निशंक ने मुझसे खंडूड़ी विरोधी खेमे का प्रमुख बनने को कहा।

1996 में भी खंडूड़ी ने निशंक को यूपी में मंत्री बनवाकर मेरे साथ धोखा किया। खंडूड़ी को हटाने की मुहिम शुरू हुई तो निशंक ने मुझ पर असंतुष्ट विधायकों के साथ दिल्ली चलने का दबाव डाला।

लेकिन चूंकि मेरी नाराजगी के बावजूद भी खंडूड़ी सीएम के लिए उपयुक्त थे, इसलिए मैं दिल्ली नहीं गया। लेकिन बाद में दबाव बढ़ा तो 9 अगस्त 2008 को 19 विधायक, चार मंत्रियों के साथ दिल्ली गया।

इनमें निशंक को छोड़कर 23 विधायकों ने भगतदा को सीएम बनाने की मांग की। अभी तक निशंक अप्रत्याशित रूप से खंडूड़ी से मिल चुके थे। खंडूड़ी की दूसरी पाली भी घातक रही।

वह विधानसभा चुनाव में खुद भी हार गए और 14 चहेतों में से तीन ही जीते।

लेखक ने पुरानी घटना का जिक्र करते हुए कहा कि कितना बड़ा फर्क कि खंडूड़ी सीएम बनने के बाद कोटद्वार चुनाव लड़ने गए तो सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने देहरादून आकर विरोध किया और चंद्रभानु गुप्त यूपी के सीएम बनने के बाद रानीखेत आए तो स्वागत के लिए भीड़ उमड़ पड़ी।
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ये भी मुट्ठी तान कर खड़े हैं सामने

एक समय था जब 2007 में हरक सिंह रावत नेता प्रतिपक्ष बने तो रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल व पूर्व कैबिनेट मंत्री टीपीएस रावत धूमाकोट से विधायक थे।

उन्होंने हरक के इस पद पर बैठने से नाराज होकर पार्टी ही नहीं छोड़ी, विधायकी से भी इस्तीफा दे दिया था।

वह इतना नाराज हुए कि उन्होंने अपनी सीट से तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी को चुनाव लड़ाकर जितवा दिया। खंडूड़ी पौड़ी से सांसद थे, उन्होंने यह सीट खाली कर टीपीएस को उप-चुनाव लड़वाकर संसद भेजा।

लेकिन आज टीपीएस भी खंडूड़ी के खिलाफ खड़े है। हरक के नामांकन के दिन टीपीएस ने लोगों को आहवान किया कि खंडूड़ी के लिए कोटद्वार की हार वाली कहानी दोहराई जाए।
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