उत्तराखंड में वन्यजीवों, खासकर बाघ, गुलदार और हाथी के शिकार की हर साल बड़ी संख्या में मौत होती है।
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जहर देकर मारने की आशंका ज्यादातर मामलों में अवैध शिकार या जहर देकर मारने की आशंका रहती है, लेकिन वन विभाग मामले की तह तक जाने की कभी कोशिश नहीं करता।
हर बार किसी वन्यजीव की मौत पर खानापूर्ति के लिए विसरा जांच के लिए सीवीआरआई (सेंट्रल वेटरिनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) भेज दिया जाता है, लेकिन इसकी रिपोर्ट कभी मंगाई ही नहीं जाती। विभाग के इस लापरवाह रवैये से न तो वन्यजीवों के शिकार पर अंकुश लग पाता है, न शिकारियों पर।
बाघ का शव बरामद किया गया
एक जून 2013 को कार्बेट टाइगर रिजर्व से सटे तराई पश्चिमी वन प्रभाग के आम पोखड़ा में बाघ का शव बरामद किया गया। विसरा का सैंपल सीवीआरआई और भारतीय वन्यजीव संस्थान भेजा गया, लेकिन रिपोर्ट नहीं आई। ऐसा क्यों हुआ, इसका जवाब अधिकारियों के पास नहीं है।
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29 मई को तराई पश्चिमी वन प्रभाग के आम पोखड़ा में ही पांच दिन पुराना बाघ का शव बरामद किया गया। आशंका जताई गई थी कि जहर देकर बाघ का शिकार किया गया। विसरा जांच के लिए केंद्रीय एजेंसियों को भेजा गया, लेकिन अब तक जांच रिपोर्ट नहीं आई।
27 मई को ढेला रेंज में बाघिन का सड़ा हुआ शव मिला। जलस्रोत के पास इसकी मौत हुई थी। आशंका थी कि इसे भी जहर देकर मारा गया। विसरा जांच के लिए सीवीआरआई और भारतीय वन्यजीव संस्थान को भेजा गया, लेकिन रिपोर्ट का कोई पता नहीं है।
आरटीआई से खुली थी रिपोर्ट
कार्बेट टाइगर रिजर्व के बिजरानी रेंज में मई 2012 में एक बाघिन का मांस बरामद हुआ था। शुरुआत से ही वन विभाग मामले को दबाने की कोशिश में जुटा रहा। बरामद मांस को किसी अन्य जीव का बताने की भी पूरी कोशिश की गई।
हालांकि, खुलासे के बाद मांस का नमूना जांच के लिए डब्ल्यूआईआई भेजा गया लेकिन महीनों बाद तक भी विभाग ने रिपोर्ट मंगाना जरूरी नहीं समझा। आखिर पीपुल फॉर एनिमल्स (पीएफए) ने सूचना का अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो रिपोर्ट बाहर आ गई। इसके बाद खुलासा हुआ कि मारी गई वन्यजीव बाघिन ही थी।
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