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...तो इसलिए बढ़ रहे हैं सब्जियों के दाम

Mon, 11 Nov 2013 09:57 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
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बाजार में कोई एक सब्जी नहीं बल्कि सभी तरह की तरकारियों के दाम बढ़े हुए हैं। हर कोई जानना चाहता है कि इसकी वजह क्या है? अमर उजाला ने इसकी पड़ताल करने की कोशिश की तो कई दिलचस्प पहलू सामने आए।
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मौसम ने नहीं दिया साथ
इस साल मौसम ने भी किसानों का साथ नहीं दिया है। समय से पहले न केवल जमकर बारिश हुई बल्कि पूरे सीजन लगातार होती रही। बाद में भी देर तक बरसात होती रही। इस वजह से किसान सब्जियों का उत्पादन नहीं कर पाए। जिला उद्यान अधिकारी अमर सिंह कहते हैं कि बारिश ने पहाड़ से लेकर मैदान तक में सब्जियों के उत्पादन पर असर डाला है।

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अब तक बाजार में फूल गोभी और आलू की नई फसल आ जाती थी लेकिन इस साल ऐसा नहीं हो पाया है। पहाड़ पर भी बारिश की वजह से आलू की फसल प्रभावित हुई है। यही वजह है कि आलू और फूल गोभी की कीमतों में तेजी बनी हुई है। यही हाल अन्य सब्जियों का भी है।
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टमाटर की हो रही होल्डिंग
देहरादून में टमाटर या तो पहाड़ से आता है या मैदान से। लेकिन अभी टमाटर की फसल कहीं भी तैयार नहीं है। जानकार बताते हैं कि इस समय टमाटर बाजार में कोल्ड स्टोर से आ रहा है। ऐसे में मांग अधिक और आपूर्ति कम होने से टमाटर के दाम बढ़ गए हैं। कुछ लोग इसका स्टाक करके भी अधिक मुनाफा वसूली कर रहे हैं।

बिचौलिये काट रहे हैं चांदी
सब्जियों के दाम को नियंत्रित करने के लिए बाजार में कोई सही क्रय-विक्रय प्रणाली नहीं है। अधिकतर किसान अपनी सब्जी खेत में ही व्यापारी को बेच देते हैं। कुछ सीधे मंडी लाते हैं। किसान से सब्जी खरीदने के बाद व्यापारी अपना मुनाफा वसूलने के बाद मंडी में फसल बेचता है।

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इसके बाद यहां पर फुटकर व्यापारी सब्जी को खरीदता है। मंडी में आढ़ती और अन्य ट्रेडिंग का भार भी इस पर लाद दिया जाता है। इस तरह जो सब्जी किसान से 10-15 रुपए में खरीदी जा रही है, वह उपभोक्ताओं तक 50-70 रुपए में पहुंच रही है। किसान और उपभोक्ता के बीच में तीन से चार बिचौलिए होने की वजह से उनके मुनाफे की मार उपभोक्ताओं पर पड़ रही है।

सब्जियों का घोषित हो समर्थन मूल्य
जानकार बताते हैं कि सब्जियों के दामों को नियंत्रित करने के लिए शासन और प्रशासन स्तर से कोई प्रणाली नहीं बनाई गई है। न तो सब्जी की फसलों का समर्थन मूल्य घोषित किया जाता है न ही इसके दामों को महंगाई के इंडेक्स में शामिल किया जाता है। इस वजह से सब्जियों के दाम बेलगाम हो जाते हैं।

उचित दाम वाली दुकानें खोली जाएं
शासन और प्रशासन को चाहिए कि सब्जी की बिक्री के लिए शहर में उचित दाम की दुकानें खोली जाएं। यह दुकानें न केवल सब्जी मंडी में बल्कि शहर में कई जगहों पर खोली जानी चाहिए। उचित मूल्य वाली दुकानें शहर में खुलेंगी तो इनके दामों पर नियंत्रण लग सकेगा।

मंडी व फुटकर विक्रताओं पर रहे प्रशासन की निगाह
जानकार कहते हैं कि सब्जी के दामों को नियंत्रित करने के लिए शासन को चाहिए कि वह प्रशासन को निर्देशित करे। प्रशासन के अधिकारियों की एक टीम बनाई जाए मंडी से लेकर फुटकर विक्रेताओं पर निगाह रखे। अधिक मुनाफाखोरी पर उन्हें दंडित करे। यदि ऐसा किया जाए तो जो लोग जमाखोरी या अधिक मुनाफाखोरी कर रहे हैं उन पर नियंत्रण लग जाएगा और सब्जियों का दाम नियंत्रित हो सकेगा।

कंपनियां भी जिम्मेदार
जानकार बताते हैं कि टमाटर, आलू और मिर्च की फसल से तरह-तरह के उत्पादन बनाने वाली विभिन्न कंपनियां भी सब्जी के दामों में उछाल के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। ये कंपनियां अपना उत्पाद बनाने के लिए किसानों से थोक में फसलें खरीद लेती हैं। इससे बड़ा हिस्सा किसानों से सीधा इन कंपनियों को पहुंच जा रहा है।

कंपनियां इनसे उत्पाद बनाकर बाजार से तगड़ा मुनाफा कमा रही हैं लेकिन इसका फायदा न तो किसानों को मिल रहा है न ही उपभोक्ताओं को।

महंगाई ने बढ़ाई किसानों की लागत
सब्जियों के दाम बढ़ने की एक वजह सब्जी उत्पादक किसानों की लागत बढ़ना भी बताया जा रहा है। जिला उद्यान अधिकारी अमर सिंह कहते हैं कि महंगाई की वजह से किसानों को खाद, पानी, बीज, बिजली और डीजल सब महंगा मिल रहा है। ऐसे में सब्जियों की उत्पादन लागत बढ़ गई है। किसान लागत सहित अपनी मेहनत का फल जब तक नहीं पाएगा, बाजार में सब्जी नहीं बेचता। ऐसे में दाम बढ़ना वाजिब है।

कैसे हो रही है मुनाफाखोरी
एक कारोबारी किसान से उसके खेत में ही आलू की फसल 5 रुपए प्रति किलो की दर से खरीद लेता है। उसके बाद वह आलू को मंडी में लाता है। यहां पर वह खेत से खुदाई और ढोने की लागत के साथ अपनी मेहनत को जोड़कर आलू को 15 रुपए प्रति किलो के हिसाब से आढ़ती को बेचता है।

मंडी में आढ़ती 20 से 25 रुपए प्रति किलों के हिसाब से फुटकर व्यापारी को आलू बेचता है। फुटकर व्यापारी मोहल्ला और गली-गली जाकर 40-50 रुपए में आलू उपभोक्ता को बेचता है। इस तरह पांच रुपये का आलू उपभोक्ता तक 50 रुपए में पहुंच रहा है। यही हाल बाकी सब्जियों का भी है।
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