राज्य बनने के बाद उत्तराखंड ने नगर निगम और नगर पालिका/पंचायतों के लिए बने उसी एक्ट को स्वीकार किया गया है, जो यूपी के जमाने से चला आ रहा है। नगर निगम एक्ट 1959 का है, जबकि नगर पालिका/पंचायतों का एक्ट 1916 का बना है।
इनमें संपत्ति कर के लिए पांच वर्ष में एक बार निकाय बोर्ड के स्तर पर संपत्ति कर निर्धारित करने की बात शामिल है। वर्ष 2016 में उत्तराखंड सरकार ने नगर निगम एक्ट 1959 में संशोधन कर संपत्ति कर के लिए स्व कर निर्धारण प्रणाली को भी शामिल कर लिया है। शहरी विकास सचिव शैलेश बगोली के अनुसार, पालिका/पंचायतें चूंकि अलग एक्ट से संचालित होती हैं, इसलिए इनके लिए नए सिरे से सारी कवायद की जा रही है।
नगर पालिका/पंचायतों में संपत्ति कर की नई व्यवस्था लागू होती है तो यह सबके लिए फायदेमंद होगी। लोगों के नजरिये से देखें तो अभी तक कर निर्धारण पूरी तरह से निकाय बोर्ड के हाथ में है। स्व कर प्रणाली में भवन स्वामी खुद ही अपने कर का आकलन करके निकाय को बताएगा। निकाय के स्तर पर भी जांच होगी और हर बिंदु पर सहमति बनाते हुए कर निर्धारित होगा।
इसके अलावा, आज की तारीख में नगर पालिका/पंचायतों में संपत्ति कर में एकरूपता नहीं है। संबंधित निकाय अपने हिसाब से तय करता है कि कितना कर लिया जाना है। संशोधन के बाद एकरूपता का रास्ता भी खुलेगा। निकायों के लिहाज से देखें तो यह व्यवस्था उनके राजस्व को कई गुना बढ़ाने वाली साबित होगी।
नगर निगमों की तरह ही पालिका/पंचायतों में भी स्व कर निर्धारण के लिए ड्राफ्ट तैयार हो गया है। कई तरह के संशोधन होने हैं। जल्द ही इसे कैबिनेट में रखा जाएगा।
- मदन कौशिक, शहरी विकास मंत्री उत्तराखंड