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जीते तो कुछ नहीं, हारे तो ये मिलेगा!

Fri, 16 May 2014 08:23 AM IST
अनूप वाजपेयी/अमर उजाला, देहरादून
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16वीं लोकसभा के गठन के लिए 16 मई को आ रहे नतीजे उत्तराखंड के कुछ नेताओं को राजनीतिक बिसात पर नई चाल देंगे।
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वहीं कुछ की मात उन्हें राजनीतिक परिदृश्य से ओझल करेगी। एग्जिट पोल के नतीजों को अगर जस का तस मान लें तो भाजपा के तीन बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री केंद्रीय राजनीति का हिस्सा बन जाएंगे।

कांग्रेस में हरक सिंह रावत और रेणुका रावत अगर हारते भी हैं तो उनके राजनीतिक ग्राफ में कोई विशेष फर्क नहीं पड़ने वाला है। जबकि हरिद्वार की हार-जीत का सीधा असर मुख्यमंत्री हरीश रावत की राजनीति पर पड़ेगा।
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खंडूड़ी को केंद्रीय मंत्रिमंडल तक ले जा सकती है जीत

भाजपा के भुवन चंद्र खंडूड़ी अगर चुनाव जीतते हैं तो वह पांचवीं बार संसद में पौड़ी का प्रतिनिधित्व करेंगे। खंडूड़ी की जीत उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल तक ले जा सकती है।

खंडूड़ी लंबे समय तक सांसद रहे हैं लेकिन पार्टी ने उन्हें प्रदेश की राजनीति से ही अधिक जोड़कर रखा। खंडूड़ी पौड़ी से एक चुनाव हार भी चुके हैं।

अगर ऐसी नौबत फिर आती है तो शायद खंडूड़ी को अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने में दिक्कतें आएंगी। ऐसा इसलिए भी क्योंकि विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए जरूरी खंडूड़ी ही कोटद्वार से विधानसभा चुनाव हार गए थे।

निशंक हारे तो गिरेगा राजनीतिक ग्राफ

पूर्व मुख्यमंत्री निशंक अगर हरिद्वार से चुनाव जीतते हैं तो शायद प्रदेश की सबसे बड़ी जीत कही जाएगी। उनकी टक्कर कांग्रेस प्रत्याशी रेणुका रावत से ना होकर प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत से थी।

चुनावी पंडितों और एग्जिट पोल के नतीजों में निशंक को कमजोर माना जा रहा है। ऐसे में उनकी जीत उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल तक भी ले जा सकती है।

हां, अगर निशंक हारते हैं तो उनकी विधायकी तो बरकरार रहेगी उनका राजनीतिक ग्राफ गिरेगा। पार्टी ने ऐसे समय में उन्हें बेहतर उम्मीदवार मानते हुए ही दांव खेला था।

राजनीति में और गति देगी कोश्यारी की जीत

भगत सिंह कोश्यारी वर्तमान में राज्य सभा सांसद हैं। संघी पृष्ठभूमि और पार्टी की संगठनात्मक क्षमता साथ नैनीताल सीट से लोकसभा चुनाव जीतना उन्हें और मजबूती देगा।

नैनीताल को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है और यहां कांग्रेस लगातार दो बार से प्रतिनिधित्व कर रही है। उनकी जीत उन्हें राजनीतिक सफर में और गति देगी।

कोश्यारी चुनाव हारते हैं तो उन्हें लंबे समय तक अपने अस्तित्व के लिए लड़ना होगा। कोश्यारी अल्मोड़ा से लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। उनकी हार उनके राज्यसभा की राह भी रोकेगी।

मजबूत दावेदार बनकर उभरेंगी रानी माला राज्यलक्ष्मी

उपचुनाव में अपनी ताकत दिखा चुकी माला राज्यलक्ष्मी शाह अगर टिहरी से चुनाव जीतती हैं तो सालों से चली आ रही राजनीतिक विरासत की मजबूत दावेदार बनकर उभरेंगी।

टिहरी सीट एक बार फिर राजघराने से जोड़कर ही देखी जाएगी। रानी चुनाव हारती हैं तो साफ हो जाएगा कि राजघराने के प्रति लोगों की आस्था समय के साथ बदल रही है।

साथ ही उपचुनाव के बाद 18 महीने के कार्यकाल को रानी केराजनीतिक प्रदर्शन से जोड़कर देखा जाएगा। जो उन्हें राजनीतिक तौर पर कमजोर करेगा।

अजय टम्टा का पार्टी में बढ़ेगा कद
अजट टम्टा अगर विधानसभा से लोकसभा का सफर तय करते हैं पार्टी में उनका कद हर हाल में बढ़ेगा। अल्मोड़ा सुरक्षित सीट से टम्टा पिछला चुनाव मामूली अंतर से हारे थे इसीलिए पार्टी ने उन पर दुबारा भरोसा जताया।

टम्टा बतौर सांसद अपनी पहचान रखेंगे लेकिन प्रदेश की राजनीति में पार्टी उन्हें खास वर्ग के लिए बड़ी जिम्मेदारी भी सौंप सकती है।

टम्टा अगर इस चुनाव में भी सफल नहीं हुए तो अल्मोड़ा संसदीय सीट के लिए उनका दावा हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।

राष्ट्रीय नेताओं के बीच हीरो की तरह होंगे हरक

पौड़ी सीट पर हरक सिंह रावत ऐसे समय चुनाव लड़ने को तैयार हुए जब पार्टी संकट में थी।

ऐसे में उनकी जीत प्रदेश में उनका राजनीति कद बढ़ाएगी। इतना ही नहीं एग्जिट पोल के नतीजों से इतर हरक सिंह जीतते हैं तो राष्ट्रीय नेताओं के बीच हीरो की तरह होंगे।

उत्तराखंड में खंडूड़ी को हराने के मायने कांग्रेस भी जानती है। हरक सिंह के चुनाव हारने की स्थिति में उनका मंत्री पद बरकरार रहेगा और उन्हें प्रदेश की राजनीति में दूसरी पंक्ति के नेताओं की पहचान से संतुष्ट होना पड़ेगा।

हरीश रावत के लिए राजनीतिक तोहफा
रेणुका रावत के जीत और हार के मायने मुख्यमंत्री हरीश रावत की हार-जीत है। रेणुका चुनाव जीतती हैं तो पार्टी के साथ हरीश रावत के लिए राजनीतिक तोहफा होगा।

हरीश रावत को यह साबित करने का मौका मिलेगा हरिद्वार सीट पर उनकी पकड़ बाकी है। साथ ही आलाकमान केसामने टिकट को लेकर रखा गया तर्क सही साबित होगा।

रेणुका के चुनाव हारने का सीधा असर भी हरीश रावत पर पड़ेगा। रावत के प्रतिद्वंद्वी हरिद्वार सीट पर उनके दावे के साथ उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी भी हिलाने में जुट जाएंगे।

अल्मोड़ा के बाद हरीश रावत का दूसरी बार उन्हें हरिद्वार से चुनाव लड़ाने का फैसला आगे की राह रोकेगा।

केसी. सिंह बाबा नैनीताल सीट पर अगर केसी.सिंह बाबा की हैट्रिक लगती है तो उनके राजनीतिक कैरियर पर उठने वाले सवाल हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे।

उनकी पहचान मैदान की खिलाड़ी के साथ-साथ राजनीतिक खिलाड़ी के तौर पर भी होने लगेगी। दस जनपद से उनके रिश्तों और टिकट को लेकर आवाज उठाने वाले उनके प्रतिद्वंद्वियों की बोलती भी बंद होगी।

बाबा की हार उन्हें राजनीतिक मैदान से दूर ले जाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रतिद्वंद्वी इसी बार विकल्प को लेकर लामबंद थे।
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साकेत बहुगुणा को मिलेगी बेहतर शुरुआत

हेमवती नंदन बहुगुणा की तीसरी पीढ़ी के नेता साकेत बहुगुणा अगर चुनाव जीतते हैं तो उनके राजनीतिक जीवन को तो बेहतर शुरूआत मिलेगी ही साथ ही पिता विजय बहुगुणा की राजनीतिक जमीन को भी मजबूती मिलेगी।

साकेत पहला चुनाव टिहरी से हार चुके हैं ऐसे में उनका जीतना विरोधियों के एक साथ कई सवालों का जबाव होगा।

साकेत की दूसरी हार उन्हें राजनीतिक परिदृश्य से ओझल कर फिर से वकालत के पेशे की ओर ले जा सकती है। उनकी हार का खामियाजा उनके पिता के राजनीतिक जीवन पर भी दाग लगाएगा।

हरीश रावत को मिलेगी मजबूती
सांसद प्रदीप टम्टा अगर दूसरी बार जीत बरकरार रखकर लोकसभा पहुंचते हैं तो उनके लिए भविष्य की राजनीति और सुगम हो जाएगी।

हरीश रावत के निकट माने जाने वाले टम्टा की जीत हरीश रावत को भी मजबूती देगी। प्रदीप टम्टा की हार के साथ अल्मोड़ा में फिर से भाजपा की वापसी होगी जो कांग्रेस की सालों की मेहनत पर पानी फेरेगी।

हरीश रावत यहां से तीन बार सांसद जरूर रहे हैं लेकिन उनकी लगातार चार बार की हार का बदला टम्टा ने ही लिया था। प्रदीप टम्टा की जीत-हार भी प्रदेश की राजनीति से सीधे तौर पर जुड़ी है।
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