फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गुजरात ने दिया सबकुछ, अब भूल गए अपना 'देस'

Sun, 06 Apr 2014 08:24 AM IST
वडोदरा से विजय त्रिपाठी
विज्ञापन
विज्ञापन
वाराणसी के गांव जयापुर (पोस्ट जखनी) के कृपाशंकर सिंह यहां करीब तीन दशक से बनारसी साड़ियों का व्यापार कर रहे हैं।
विज्ञापन


कहां वाराणसी...कहां वडोदरा, इस बाबत सवाल पर वे तफसील से अपना सफरनामा खोल बैठते हैं। बताते हैं-साल 1970 में रोजी-रोटी के जुगाड़ में बड़े भाई यहां आए। कुछ दिन नौकरी के बाद उन्होंने दूध-मिठाई का काम शुरू किया।

कारोबार जमने लगा तो बनारस से सभी छह भाइयों को एक-एक कर यहीं बुला लिया। वर्ष 1974 में कृपाशंकर भी यहां आ गए।

भूमिहार ब्राह्मण कृपाशंकर अब पक्के गुजराती

शुरू में 30 रुपए महीने की नौकरी की, फिर दूध के कारोबार से होते हुए बनारसी साड़ियों की होलसेल दुकान खोल ली। अब उनके बेटे भी इस बिजनेस में उनका हाथ बंटाते हैं।

शहर के पॉश इलाके अकोटा कॉलोनी में परिवार के साथ रह रहे जाति से भूमिहार ब्राह्मण कृपाशंकर अब पक्के गुजराती हो गए हैं। यहां के रीति-रिवाज मनाते हैं और गुजरातियों के तीज-त्योहार में पूरे परिवार के साथ बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

यहां कोई परायापन नहीं लगता, इस पर वे कहते हैं यहां तो ज्यादा अपनापन है। बेटी रात 12 बजे भी बाहर से आती है तो कोई डर नहीं लगता लेकिन जब कभी शादी-बरात में बनारस जाते हैं तो दिन में भी बहू-बेटी के बाहर जाने पर डर लगा रहता है।

वडोदरा में बनारस के करीब 200 परिवार

इसी तरह वडोदरा में बनारस के करीब 200 परिवार रोजगार धंधे में लगे हैं। गोरखपुर के रहने वाले योगेंद्र साहनी भी यूपी के मुकाबले वडोदरा के गुन गाते नहीं अघाते।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग पूर्वांचल लोकहित मंडल बनाकर आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसके सदस्य मिलकर गरबा व गुजराती नववर्ष जैसे आयोजन भी करते हैं। इस समुदाय की तादाद करीब 22 हजार है।

बेरोजगार युवकों का तेजी से हुआ रुख
वडोदरा में पिछले एक दशक में इंडस्ट्री का विस्तार होने से हिंदीभाषी क्षेत्रों के बेरोजगार युवकों का इधर रुख तेजी से हुआ है। ज्यादातर युवक यहां अपोलो टायर के प्लांट में काम करते हैं।

पेंटिंग-फिनिशिंग के काम में भी बहुत लगे हैं। काम की बेहतर स्थितियों और सुरक्षा का माहौल मिलने के कारण उनका झुकाव भाजपा की तरफ होना स्वाभाविक है।

आज इनके पास सबकुछ है

एक दशक पहले तक यहां अक्सर दंगे-फसाद होते रहते थे और इसका सबसे ज्यादा असर इसी मजदूर तबके पर ज्यादा होता था।

इस शहर की कुल आबादी करीब 14 लाख में ढाई लाख के आसपास हिंदीभाषी लोग हैं। बिहार के सीवान जिले के मूल निवासी उद्धव भगत भी यहां के पुराने बाशिंदे हैं।

बताते हैं कि गांव से 25 साल पहले दो जोड़ी कपड़े के साथ यहां आया था। आज मेरे पास सब कुछ है। अपना मकान, मोटर-कार और इंडस्ट्रियल फैब्रिकेशन का खुद का बिजनेस।
विज्ञापन

बिहार के करीब 72 हजार लोग बसे हैं यहां

काम की तलाश में पूर्वी यूपी और बिहार के लोग जब यहां ज्यादा आने लगे तो उन्होंने 1982 में कुछ लोगों के साथ मिलकर बिहार सांस्कृतिक मंडल का गठन किया। इस समय वडोदरा में बिहार के करीब 72 हजार लोग बसे हैं।

संक्षेप में जाने
- ज्यादातर हिंदीभाषी लोगों का झुकाव भाजपा की की तरफ है।
- बनारस के करीब 200 परिवार यहां कारोबार या नौकरी में लगे हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें